आँगन में धूप उतर रही है

आँगन में धूप उतर रही है |
कोहरे के पर कुतर रही है ||

रंग और कूँची तैयार रखो,
एक नई तस्वीर उभर रही है ||

आओ, बात करें बातें बनायें,
बरसों से जो बिगड़ रही है ||

यकीनन मिटेंगे फासले अब,
हवा की फ़ितरत बदल रही है ||

मत आँक वजूद गुजरे वक़्त से,
सूरते-ज़िंदगी सुधर रही है ||

थक-हारकर न बैठ ओ ‘माही’,
अब मंज़िलें इधर-उधर रही है ||


तारीख: 19.06.2017                                                        महेश कुमार कुलदीप






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