बुझती शमा

गर तुम्हे जाना ही है, खुद ही ,शमा को बुझा  के जाना।
क्यों, इस मायूस दिल में, फिर से, आस जगा के जाना। 

बहुत अर्से के बाद, आज फिर, शमा की थी हमने रोशन,
रहम तुम्हारा,फिर से उन अंधेरो को यहाँ सजा के जाना।

ऐसे किसी नायाब तोहफे की तो खाहिश न की थी हमने,
बस येही कहा थे महफ़िल में  थोड़ा वक़्त बिता के जाना।

जाने क्यों लगता है तेरे दिल में आ बसा है कोई, रकीब,
वरना मुमकिन नहीं तेरा शर्म से  सर को झुका के जाना।

यह तो वीरान बस्ती थी, तेरी आरज़ू पे ही थे हम जिन्दा,
मेहरबानी तेरी, जो सोचा, मेरे ख्वाब को दफना के जाना।

तेरी इसमें,खता नहीं कोई, कि ये सब अपनी ही गलती है,
फासला अमीर-गरीब का हमने, तुझ से निभा के जाना।


तारीख: 19.06.2017                                                        राज भंडारी






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