दैर कू-ए-यार है

 

मेरी दिवानगी की राह में, ना कोई मज़हब की दीवार है
मेरा इश्क़ है मेरी बन्दगी, मेरा दैर कू-ए-यार है

मुझे क्या ग़रज़ किसी रस्म से, क्या वास्ता रिवाज से
मेरी ज़िन्दगी हसीन हो, गर साथ तेरा प्यार है 

तुम जिस जगह मुझे छोड़ के, वक़्त के साथ निकल गये
मुझे आज भी उसी मोड़ पे, तुम्हारा हीं इंतिजा़र है

मेरे आशियें को फूंक के, मेरा गुलसिताँ बिखेर के
किस वास्ते ना जाने अब, मेरी तलाश में बहार है

तेरे अश्क़ की हर बुँद से, रिश्ता है मेरी आँखो का
तुझे एक पल भी जो ग़म मिले, मेरी हर खुशी बेकार है

तुझे चाहना जुनून है, तुझे मांगना दुआ मेरी
ये जान कर ख़फ़ा न हो, मेरे दिल का तू क़रार है

ए दिल नाज़ कर बख़्त पे, तेरी ज़ीस्त का सिला मिला
पुछते हैं आज वो, ये किस शक़्स का मज़ार है


तारीख: 05.08.2017                                                        प्रमोद राजपुत






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