इक वो है अपने जख्मो को रोज़ दिखाते रहते है

 

इक वो है अपने जख्मो को रोज़ दिखाते रहते है,
इक हम है जो अपने दिल का दर्द छिपाते रहते है ।

माना इस फुरकत से तेरे दिल में दर्द हजारो है, 
देखो हम भी ग़म के आलम में मुस्काते रहते है ।

तुझको मुझसे शिकवा है तो मुझको भी तुझसे शिकवा, 
अपनी अपनी चाहत पे इल्जाम लगाते रहते है ।

क्या करते हम जख्म दिखाके तुमने कब इनको समझा, 
तब ही तो हम खुद को जानाँ और हसाँते रहते है ।

लगता है जागे हो तुम भी जाने कितनी रातो से, 
हमको गम के साये सारी रात जगाते रहते है 

मै हसँता हूँ तो भी तुझको लगता है मै अच्छा हूँ 
तेरी खातिर हम भी अपना दर्द बढाते रहते है ।

है मुझको अहसास यकीनन तुम खोये से रहते हो, 
हम भी सहराओ मे तन्हा ख़ाक उडाते रहते है ।

तेरे दिल में यादों की भड़की रहती है चिगांरी, 
मुझमें भी पानी के छीटें आग लगाते रहते है ।

तू पत्थर की नगरी में रहती है कुछ लाचार 'लकी',
हम भी ग़म के पत्थर से घर रोज़ बनाते रहते है ।।।


तारीख: 15.06.2017                                                        निमेष






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