हम दोनों के दरमियां, ये अजब फ़ासिला रहा

 

हम दोनों के दरमियां,  ये अजब फ़ासिला रहा
मैं उसके करीब रह कर भी, उस से जुदा रहा

साहिल पे जिसकी डूबी, हज़ारों कश्तियाँ थी
वही शख़्स तमाम उम्र, मेरा नाख़ुदा रहा

वक़्त-ए-रुख़सत सर झुका के, वो यूँ गया कि मैं
बहुत दूर तलक सफ़र में, उसे सोंचता रहा

अपने अक्स में भी ना, मैं ख़ुद को पा सका
किस को न जाने आज तक, मैं ढुंढ़ता रहा

जब आँख खुली, था दूर तक तन्हाईयों का ख़ौफ़
बस ख़्वाब हीं में, ज़िंदगी से वास्ता रहा

मंज़िल से मुड़ के देखा, तो थे रास्ते उदास
जाने किस की जुस्तजू में, मैं भागता रहा

मेरी हीं तरह तनहा था, आसमाँ में चाँद
कल शब उसी के साथ, मैं भी जागता रहा

मैं चाहता था उसको, अपनी जान से भी ज़ियादा
इसी बात पर वो शायद, मुझसे बदगुमाँ रहा

थोड़ा बदबख़्त रहा मैं, था आदमी बुरा नहीं
मैं किसी और के नसीब की, सज़ा काटता रहा

एक इश्क़ और चंद ग़ज़लों के, सिवा ज़िंदगी में
किसी की याद और तन्हाईयों, का सिलसिला रहा

मेरी बन्दगी में यूँ तो,कोई कमी न थी मेरे ख़ुदा
फिर एक बेवफ़ा क्यूँ हर कदम, मेरा रहनुमा रहा


तारीख: 12.08.2017                                                        प्रमोद राजपुत






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