इस फ़िज़ा की मुस्कराहट के पीछे कोई श्मशान नज़र आता है

जो देखूँ दूर तलक तो कहीं बियाबाँ , कहीं तूफाँ नज़र आता है 
इस फ़िज़ा की मुस्कराहट के पीछे कोई श्मशान नज़र आता है

इंसानों ने अपनी हैवानियत में आके किसी को भी नहीं बख्शा है
कभी ये ज़मीं लहू-लुहान तो कभी घायल आसमाँ नज़र आता है 

मशीनी सहूलियतों ने ज़िन्दगी की पेचीदगियाँ यूँ बढ़ा दी हैं कि 
जिस इंसान से मिलो,वही इंसान थका व परेशान नज़र आता है  

क़ानून की सारी ही तारीखें बदल गई हैं पैसों की झनझनाहट में 
मुजरिमों के आगे सारा तंत्र ही न जाने क्यों हैरान नज़र आता है  

किताबें,आयतें,धर्म,संस्कृति,संस्कार,रिवाज़ सब के सब बेकार 
शराफत की आड़ में छिपा सारा महकमा शैतान नज़र आता है 

बच्चों की मिल्कियत छीनके अपने उम्मीदों का बोझ डाल दिया
मेरी निगाहों में अब तो हर माँ-बाप ही बेईमान नज़र आता है 
 


तारीख: 07.09.2019                                                        सलिल सरोज






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