कहकाशों से निकल के

 

कहकाशों से निकल के हम सहराओं में आ गए हैं
फूल सब छूट गए काँटे पाओं में आ गए हैं

वो पल भी देखे हैं इन आँखों ने जब तुम साथ थे
ये भी है के सब मंज़र शब-ऐ-हिज़्र के निगाहों में आ गए हैं

इन सब में मौज़ों की क्या ग़लती है
हम ही हैं जो डूबने दरियाओं में आ गए हैं

तुम साथ होते तो हम ही पूरे कर लेते
वो सब ख़्वाब जो अब दुआओं में आ गए हैं

छोड़ो अब किस से बचेंगे हम
शैतान के सब फ़न जो मसीहाओं में आ गए हैं


तारीख: 15.06.2017                                                        राहुल तिवारी






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