कौन रुकता है मुसीबत सिर के ऊपर देखकर

कौन रुकता है मुसीबत सिर के ऊपर देखकर
बच निकलते हैं सभी गिरता हुआ घर देखकर


घोषणाएँ खोखली निकलीं सभी सरकार की
सोचता है गाँव यह बारिश में छप्पर देखकर


शख़्स मीठा है बहुत वो याद रखना दोस्तो
प्यार से देगा दग़ा इक दिन वह अवसर देखकर


काश टोली बादलों की इस तरफ़ भी रुख़ करे
सारे हलधर सोचते हैं रोज़ अंबर देखकर


फिर पुराना कोट पहना है पिता ने आज भी
आज फिर टोका है माँ ने उधड़ा अस्तर देखकर


तुम भी तब  आए कि उजड़ा ये गुलिस्ताँ हो गया
क्या मिलेग अब तुम्हें ख्वाबों के खंडहर देखकर


हौसले में है नहीं मेरे कमी कोई पवन
कम समझना मत मुझे मेरे कटे पर देखकर
 


तारीख: 17.03.2018                                                        डॉ. लवलेश दत्त






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