खुदा ज़िन्दगी


थी कभी मेरी खातिर खुदा ज़िन्दगी
लग रही है मगर अब सज़ा ज़िन्दगी

छोड़ते छोड़ते इस जहां को,मुझे
दे गई प्यार से इक दुआ ज़िन्दगी

मन नही है मगर कर रहा हूँ विदा
जिससे हो ना कभी भी ख़फ़ा ज़िन्दगी

कर गया हूँगा शायद कभी मैं खता
इसलिए दे रही है सज़ा ज़िन्दगी

माँगता हूँ खुदा से यही अब दुआ
करदे थोड़ी सी मुझसे वफ़ा ज़िन्दगी

रोज़ सपनों में आकर मेरे अब 'गगन'
पूछती है तेरा ही पता ज़िन्दगी


तारीख: 14.06.2017                                                        पीयूष गुप्ता






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