ख्वाब उसने ये सजाया क्यूँ नहीं

ख्वाब उसने ये सजाया क्यूँ नहीं
नाम लबों पे मेरा उसके आया क्यूँ नहीं ।

दिल में था गर एहसास मेरे इश्क़ का
निगाहों से उसने जताया क्यूँ नहीं ।

वादे तो किये थे जन्मों साथ रहने के
फिर रिश्ता मुझसे तूने निभाया क्यूँ नहीं ।

तेरी यादों में जलना खुदपसंदी है मिरी
कहर यादों को बरपाया क्यूँ नहीं ।

लाज़मी नहीं मुझको उसका पर्दानशीं होना
दुपट्टे को हवा में फिर लहराया क्यूँ नहीं ।

एक मैं ही हूँ तेरे इश्क़ का तलबगार जो 
ये इलज़ाम "रिशु" पर लगाया क्यूँ नहीं ।


तारीख: 16.06.2017                                                        ऋषभ शर्मा रिशु






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है