किसी की यादों ने


किसी की यादों ने क़दमों में ज़ंजीरें डाल दीं
हौसलों ने हालात के आगे शमशीरे डाल दी

दिलो-ओ-दिमाग़ में तो अभी भी है मगर
किताबों से दरिया में तेरी तस्वीरें डाल दी

हम कुछ भी करके उन्हें मिटा ना सके
ज़माने ने जो हमारे बीच लकीरें डाल दीं

एक रोज़ जो बुझा था चिराग़ अब तक ना जला
घी ख़ून जिस्म रूह सब तक़दीरें डाल दीं

चलो अच्छा है अब ख़ुद से ये जंग ख़त्म हो
तुम हथियार कब के डाल चुके थे हमने भी शमशीरें डाल दीं


तारीख: 15.06.2017                                                        राहुल तिवारी






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