किया है इश्क़ मैंने इस जहां से

नहीं चाहा निकलना इस गुमाँ से
किया है इश्क़ मैंने इस जहां से ।

कोई समझे न पागल मुझको यारो
हमेशा ही डरा   हाले बयाँ से ।

लगाई आग किसने मजहबों में
धुंआ उठने लगा मेरे जहां से ।

किया खामोश जो इज़हार अब तक
अभी तो बोल दे अपनी जुबाँ से ।

कभी समझी नहीं ये बात धरती
मिलन होता नही है आस्मां से।

नज़र तुझसे मिली थी जिस जगह पर
गुजरता रोज हूँ मैं अब वहाँ से ।

नज़र महफ़िल में सबकी है रिशु पर
निकल आया हूँ जैसे कहकशाँ से ।
 


तारीख: 30.07.2017                                                        ऋषभ शर्मा रिशु






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है