लिए इक दर्द सीने में बड़े मजबूर बैठे हैं

लिए इक दर्द सीने में, बड़े मजबूर बैठे हैं,
है होंठो पे हंसी, दिल में लिए नासूर बैठे हैं,

निगाहें करम जो हम पे, कर गए हमदम मेरे,
उन्ही की जुफ्त्जू में हम, ग़मों से चूर बैठे हैं,

मुझे इंसानियत पे अब, भरोसा सा नहीं होता,
जो कल तक हमनशीं थे, अब बने मगरूर बैठे हैं,

भरी महफ़िल में यूँ, जान कर अंजान हैं बनते,
वो मेरे हमसफ़र थे, आज जा कर दूर बैठे हैं,

खिलें से हुस्न के पीछे, असल चेहरा छुपाते हैं,
वो दिल के बद से बद्तर हैं, बने जो हुर बैठे हैं,

जो कल तक आशनां ना थे,शहर की इक गली से भी,
बना कर वो हमें जरिया, हुए मशहुर बैठे हैं,

किसी की बात का तुझपे, असर कोई नहीं होगा,
सुना है बन के वो तेरे, निगाहें नूर बैठे हैं।

 


तारीख: 14.06.2017                                                        विजय यादव






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