माँ

मैंने जब जब बुढ़ी आँखों में, अश्कों को छुपते देखा है
मैंने तब तब अपने भीतर किसी, इंसाँ को मरते देखा है

आज चिलचिलाती गरमी में भी, सर्द हवायें चलने लगीं
माँ के आँचल तले एक बच्चे को, जब धूप से बचते देखा है

धुअें से लाल हुई आँखें, अपनी माँ की याद आ जाती हैं
मैंने कहीं भी गीली लकड़ी को, जब आग में सुलगते देखा है

अब जा कर मैं समझा हुँ, अपनी माँ की उस परेशानी को
जब ख़ुद को अपने बच्चों के, इंतिज़ार में जगते देखा है

आज अपने महल में तनहा हुँ, तब यादों ने ये बात कही
बचपन में टूटे घर में तुझे, संग फ़रिश्तों के रहते देखा है

उस दिन से बहुत शरमिंदा हुँ, मैं अपनी इन बुलंदियों पर
जब एक बच्चे को उसकी माँ के मैंने, आँसु पोछते देखा है

मुझे हारने का मलाल नहीं, गर ये रिश्ता बचा ले जीत तेरी
हर चौखट पर मैंने मेरी ख़ातिर, अपनी माँ को झुकते देखा है

इन्कार नहीं है वजूद ए ख़ुदा से, कभी मिला नहीं मैं उनसे लेकिन
मैंने माँ की दुआओं से दुनिया में, तक़दीर संवरते देखा है

तोड़ के सारी उम्र की हदें, जी चाहे रोने लग जाऊँ
जब भी किसी बच्चे को माँ की, गोद में रोते देखा है

कमज़ोर समझ कर तू मुझको, न डरा पायेगा मेरे रक़ीब
भगवान से मैंने अपनी माँ को, मेरी ख़ातिर लड़ते देखा है

आज जा कर अपनी क़लम पर, मुझको थोड़ा नाज़ हुआ है
चंद अशआर जब इसको मैंने, माँ पर लिखते देखा है


तारीख: 30.09.2017                                                        प्रमोद राजपुत






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