मैं भला तुझसे मुहब्बत न करूं तो क्या करूं

मैं भला तुझसे मुहब्बत न करूं तो क्या करूं
प्यार से तेरी इबादत न करूं तो क्या करूं ?

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लोग कहते है तुझे , मुझसे मुहब्बत है नही
तुम कहो जग से बगाबत न करूं तो क्या करूं ?

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उनसे होती है मुलाकाते हंसी ख़ाबों में फिर

रात की मैं बकालत न करूं तो क्या करूँ ?

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दिल दुखाया आज है उसका बिना कुछ जान कर
आज अपनी ही खिलाफत न करूं तो क्या करूं ?

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साथ मेरा है निभाती रात ही काली सदा
रौशनी से फिर अदावत न करुं तो क्या करूं ?

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लाख चोटे दी ज़माने ने मुहब्बत में तेरी
अपने जख्मों की शिकायत न करूं तो क्या करूं ?

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कुछ पलों की दूरियों से डर बहुत लगता मुझे
दूर जाने की वहशत न करूं तो क्या करूं ?

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जिस खुदा के नाम से पाया “रिशु”ये साथ है
क़र्ज़ में उसकी इबादत न करूं तो क्या करूं ?


तारीख: 18.06.2017                                                        ऋषभ शर्मा रिशु






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