मैं जितना ही हूँ,उतना तो जरूर हूँ

 

अब इस तरह मुझे न बचा के रख
फानूस के जैसे तो न सजा के रख

मैं खुद तलाश लूँगा अपनी मंज़िलें
बाज़ार में दाम मेरा न बता के रख

मैं नई  सुबह का नया सूरज सा हूँ
मुझे दिए की तरह न बुझा के रख

हैं ज़िन्दा बे-शक अहसासात सभी
यूँ असबाब के जैसे न उठा के रख

मैं जितना ही हूँ,उतना तो जरूर हूँ
यूँही बस हिसाब से न घटा के रख


तारीख: 27.07.2019                                                        सलिल सरोज






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