मेरी गली से जो तू गुजरने लगी है

मेरी गली से जो तू गुजरने लगी है
तुझको पाने की आरज़ू करने लगी है ।

जबसे हुई है रूबरू तू मुझसे
रूप से और भी निखरने लगी है ।

चल जो तू पड़ा पैसों की राह पर
आदमियत तेरी अब मरने लगी है ।

अब्तर हो गया शहर मिरा दंगे में 
देखकर आँख मेरी झरने लगी है ।

न आता कोई अब हिफाज़त को
हर रोज़ इक सीता हरने लगी है ।

लोग जोड़ते है नाम उसका मुझसे
बात उसको भी ये अखरने लगी है ।

उड़ाती थी कभी पंछियो को पिंजरे से
आज क्यू पर उनके ही कतरने लगी है ।

खाई थी कश्मे जिसने साथ चलने की रिशु
गर्दिश में देख बात से वो मुकरने लगी है ।


तारीख: 16.06.2017                                                        ऋषभ शर्मा रिशु






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