उसके जाने से मासूम दिल मेरा इस कदर वीरान हो गया

उसके जाने से मासूम दिल मेरा इस कदर वीरान हो गया,
इतनी भीड़ में कैसे, राज एक खोया हुआ, इंसान हो गया

शोरो-गुल था जिसमे, उन गुजरते हुए कितने ही काफिलों का,
एकदम से, यह वो रास्ता, अचानक कैसे, यूँ सुनसान हो गया

इस कदर सन्नाटा कि अपने ही दिल की धड़कन सुन रहा हूँ मैं,
या अल्लाह मैं तो इस गहरी तन्हाई से बहुत परेशान हो गया

क्या कहने कि उनके जाने से, किस कदर बदला है यह आलम,
और यह दिल तो अब बस एक उजड़ा हुआ खाली मकान हो गया

माफ़ कर दो मुझे यारो और पूछो न मुझसे, फिर कोई भी सवाल,
इसी शहर के लोगो के लिए मैं राज अब क्यों अनजान हो गया

चल छोड़ दोस्त तू यह बस्ती, डेरा सुफिओं का चलके कोई ढूंढे,
दुनिया को, समझाने, की कोशिश में, मैं पूरा, नाकाम हो गया

कि, दीनो मजहब को, समझने का, अब तुझे अरमान हो गया,
बस उसके जाने से मासूम दिल मेरा इस कदर वीरान हो गया !


तारीख: 19.06.2017                                                        राज भंडारी






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