अपने ही साये से डर गए हैं

 

अपने ही साये से डर गए हैं

वो जीने से पहले मर गए हैं

 

शाख पर झूम रहे थे जो पत्ते

इक तूफ़ान से बिखर गए हैं

 

जब से खत मिला है उनका

पुराने जख्म आज भर गए हैं

 

किसने याद किया है हमको

बहते हुए अश्क़ ठहर गए हैं

 

मतवाली सांझ के ढलते ही

इंतज़ार के पल गुजर गए हैं

 

हम उनसे जुदा क्या हो गए

जज्बात उनके संवर गए हैं

 

चाँद को छूने का ये अंजाम

ऊँघते अरमान निखर गए हैं

 

रात गुजरती है तारे गिनकर

वो करके ऐसा असर गए हैं

 

नींद उनको भी आती नहीं हैं

वो दे कर ऐसी खबर गए हैं

 

 'एकांत' तू कैसे भूल पायेगा

जो दिल में आकर पसर गए हैं


तारीख: 16.11.2019                                                        किशन नेगी एकांत






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