चाँद कदम कदम चलता है

एक वहम रोज़ नया बनता हैं 
एक चाँद कदम कदम चलता है 

कोई जागे जो रात भर पूरी  
तो दिन जाने क्यूँ जलता हैं 

कभी लौ ए लफ्ज़ कहती है ख़त 
कभी सफ़्हा कोरा जुबां बनता है 

लिपट बारिश से वो ओर रंग गया 
अश्क छुप कर ही ओर सजता है  

निशां-ए-नूर मिलते है अक्सर  
कोई चिराग अब भी कहीं जलता है 
 


तारीख: 29.06.2017                                                        रवि कान्त मोंगा 






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