दिल तू और क्या चाहे, भारत बंद आहे

आगामी 1 दिसंबर को करणी सेना ने फ़िल्म पद्मावती के विरोध में भारत बंद का "अधिकृत" आह्वान किया है। यह निर्णय भारी विचार- विमर्श की कोख से अनचाहे गर्भ की तरह तब जन्मा , ज़ब सेना के सेनापतियों को ये आभास हुआ कि भारत को चालू करने में वे कोई योगदान देने में वे दिव्यांग है मतलब असक्षम है तो भारत बंद करके ही अपने हुनर की सार्वजनिक नुमाईश की जाए। देश में आए दिन अलग-अलग संग़ठन अपनी माँगे मनवाने हेतु भारत बंद के सेतु का उपयोग करते है। कम लोग जानते है कि भारत बंद के दौरान विरोध प्रदर्शन कम और अपनी अक्ल का प्रदर्शन ज़्यादा मात्रा में होता है। भारत एक ऐसा अनोखा देश है जिसके चलने का अहसास तब ही होता है ज़ब कोई संग़ठन भारत बंद की घोषणा करता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि बंद का आह्वान ज़्यादातर "चालू"लोग ही करते है।

नकारात्मक प्रवृति से पीड़ित लोग भले ही भारत बंद का आह्वान करने वालो के लिए दुष्प्रचार करे लेकिन भारत बंद का आह्वान करने वाले सज्जन बड़े आशावादी दृष्टिकोण रखने वाले होते है क्योंकि उन्हें लगता है कि भारत अभी चालू अवस्था में है जिसे विरोध प्रदर्शन कर अपनी माँगे मनवाने के लिए बंद करने की आवश्यकता है। समस्या चाहे कैसी भी हो ,किसी भी  विषय से संबंधित क्यों ना हो उसे भारत के बंधित होने से अर्थात भारत बंद से जोड़ देने से उसका स्वरुप भ्रष्टाचार की तरह अखिल भारतीय हो जाता है जो कि देश में किसी भी समस्या के अस्तित्व को मंजूरी मिलने के लिए आवश्यक शर्त है।

भारत बंद, ऐसा पर्व है जो किसी तिथी या महीने का गुलाम नहीं होता है। यह बिना किसी डर या केलेंडर के ज़ब चाहे, नितीश कुमार के एनडीए में आने की तरह, आ जाता है।

भारत बंद एक ऐसा उत्सव है जिसे सभी देशवासी, जाति, धर्म और संप्रदाय के भेदभाव भूलकर एक साथ बंद रखकर मनाते है। एकता की ऐसी अनूठी मिसाल और किसी त्यौहार में देखने को नहीं मिलती है। भले ही लोग ना समझे लेकिन भारत बंध का आह्वान एक तरह से देशव्यापी एकता का अप्रत्यक्ष ऐलान करना ही तो है। जो लोग भारत बंद अर्थात एकता के इस राष्ट्रीय पर्व में बाधा डालते है उन पर क़ानूनी कार्यवाही का प्रावधान किया जाना चाहिए। कई असामाजिक तत्व भारत बंद का आह्वान होने के बाद भी अपने प्रतिष्ठान चालू रख बंद को विफल बनाने का षड्यंत्र रचते है, ऐसे लोगो को राष्ट्रीय एकता और सद्भाव के लिए खतरा मानते हुए चिन्हित किये जाने की ज़रूरत है। सरकार को भी फ्रंट फुट पर आकर,ज़रूरी कदम उठाते हुए एनजीओ और सामाजिक संगठनो को समय समय पर नियमित रूप से भारत बंद का आह्वान करने के लिए उकसाना चाहिए।

सतर्क या चिंतित होना भारतीय इतिहास और स्वभाव के ख़िलाफ़ है और इनका उल्लंघन एलओसी की तरह हम नहीं करते है, इसीलिए भारत बंद के दौरान होने वाले नुकसान पर हम अपने स्वभाव के अनुसार ज़्यादा चिंतित या सतर्क नहीं होते है क्योंकि नुकसान को हम उस निवेश की तरह देखते है जो भविष्य के लाभों को पाने के लिए पेन को आधार कार्ड से लिंक करने की तरह अनिवार्य होता है

भारत बंद का यह पावन और पूजनीय पर्व, एक देश के तौर पर हमें कामचोरी के उस अपराध बोध से भी बचा ले जाता है जो हमारे मन में भारतीय संस्कारो की वजह से "खरपरवारित" होता है। भारतीय संस्कार, भारतीय सविंधान की तरह बहुत लचीले होते है, कामचोरी और उससे उपज़े अपराध बोध दोनों को शरणागति प्रदान कर देते है।

भारत बंद का सबसे बड़ा लाभ ये होता है कि बंद के दौरान सामान्य जनजीवन अस्तव्यस्त होना एक खबर बनकर टीवी और समाचार पत्रो में बिना टिकट के अपनी सीट रिज़र्व कर लेता है जो की आम दिनों में खास लोगो के कारण मुमकिन नहीं हो पाता है क्योंकि वीआईपी मूवमेंट के कारण अक्सर आम जनता के लिए ट्रैफिक डाइवर्ट कर दिया जाता है। भारत बंद के दौरान के आम जनता को होने वाली असुविधा की सुध ली जाती है, इस मायने में भारत बंद को आम को खास महसूस करवाने के पर्व के तौर पर भी देखा जाना चाहिए और इसके लिए वे सभी सरकारी और गैर-सरकारी संगठन बधाई के बड़े बर्तन (पात्र) है जो आए दिन भारत बंद जैसे ज़नोन्मुखी यज्ञो का आयोजन कर उसमे सामाजिक सरोकारों की आहुति देते है।


तारीख: 17.12.2017                                                        अमित शर्मा 






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