मार्च एंडिंग की मार्च पास्ट 

मुझे बॉलीवुड की फिल्में बहुत पसंद है इसीलिए नहीं की वो मनोरंजन (मनोभंजन) करती है बल्कि इसलिए क्योंकि बॉलीवुड की फिल्मो में हमेशा हैप्पी-एंडिंग होती है। फ़िल्म अगर अच्छी हो तो हैप्पी एंडिंग होने से दर्शक खुशनुमा माहौल में सिनेमा हॉल छोड़ते है। अगर फ़िल्म पकाऊ हो तो फ़िल्म की एंडिंग अपने आप हैप्पी हो जाती है और दर्शक राहत की सांस लेते हुए अपनी गलती के लिए भगवान से क्षमा माँगते हुए सिनेमा हॉल से विदा लेते है।

असल ज़िंदगी में एंडिंग इतनी हैप्पी नहीं होती है खासकर के जब वो एंडिंग वित्तीय वर्ष की हो। जैसे सावन के महीने में पवन शोर करता है वैसे ही मार्च के महीने में काम का दबाव शोर और बोर करता है। एक CA होने के नाते मुझे शुरू से लगता था की अगर CA एग्जाम और मार्च एंडिंग में सबकुछ स्मूथ और सहज चल रहा है तो कहीं ना कही कुछ गंभीर समस्या है। मतलब मार्च एंडिंग में काम में कोई समस्या ना होना , एक गंभीर खतरे की तरफ संकेत करती है और मार्च एंडिंग तो अपने आप में एक खतरा है ही। इस खतरे के गुजर जाने के तुरंत बाद एक अप्रैल को "अप्रैल फूल" की व्यवस्था की गई है ताकि माहौल को फिर से सामान्य और हल्का-फुल्का बनाया जा सके।

किसी भी चालू वित्तीय वर्ष में बिक्री (सेल्स) के लक्ष्य (टारगेट) को पूरा करने के लिए बिक्री प्रबंधको (सेल्स मैंनेजरो) का चालू होना बहुत ज़रूरी है वरना मार्च एंडिंग से पहले सेल्स टारगेट पूरा ना होने पर बॉस ऑफिस से चलता कर सकता है। टारगेट काफी ऊँचे सेट किये जाते है ताकि कंपनी को ऊँचाइयों तक पहुँचाया जा सके, इसलिए जाहिर है उनको पूरा करने हेतु बहुत हवाबाजी की भी आवश्यकता होती है। टारगेट खत्म होने की कगार पर ही सेल्स मैंनेजरो को पगार मिलती है। टारगेट पूरा ना होने की दशा में वित्तीय वर्ष के साथ साथ कंपनी में एम्प्लॉयी का टेन्योर भी पूरा हो सकता है। अब टारगेट या टेन्योर दोनों में से एम्प्लॉयी की किस्मत किसे चुनती है यह अच्छे दिनों की आवक पर निर्भर करता है।

मार्च का महीना बैंक और कंपनियो के लिए वार्षिक खाताबंदी का भी होता है। वर्ष की शुरुवात में जो खाते शुरू किए जाते है, वो पर्याप्त समय और दिमाग खाने के बाद बंद कर दिए जाते है। खाताबंदी करते वक़्त बंदा या बंदी में फर्क नहीं किया जाता है और समान रूप से उनके पेशेंश का एंड कर मार्च एंडिंग करवाई जाती है। डेबिट-क्रेडिट कर खातो को बंद किया जाता है लेकिन इसका क्रेडिट हमेशा बॉस को मिलता है। खाताबंदी, नोटबंदी और नसबंदी से भी ज़्यादा तकलीफ देती है और ये दिल मांगे मोर (तकलीफ) कहते हुए हर साल मार्च में आ जाती है। खाताबंदी, नोटबंदी, नसबंदी और नशाबंदी, सरकार चाहे तो इन सारी "बंदियों"  को "लिंगानुपात" संतुलित करने में भी उपयोग में ला सकती है।

मार्च में काम का बोझ बहुत ज़्यादा हो जाता है इसलिए अनुभवी लोग ऑफिस आने से पहले अपनी अक्ल पर पड़े पत्थर को घर पर ही छोड़ आते है। लेकिन नए और अनुभवहीन लोगो को दिल पर पत्थर रखने की सलाह दी जाती है। कुछ अतिउत्साही लोगो को मार्च एंडिंग की इतनी जल्दी रहती है मानो उनका बस चले तो प्रीपेड- रिक्शा पकड़कर अप्रैल में चले जाए।

मार्च का महीना अग्रिम आयकर भुगतान का भी होता है। जनता से कर लेकर, नेता कई परियोजनाओं का अपने कर-कमलो से उद्घाटन करते है। सरकारे हमसे टैक्स एडवांस में ले लेती है लेकिन अपने चुनावी वादे कार्यकाल ख़त्म होने के बाद भी पूरा नहीं करती है। मार्च भले ही हर साल एंड हो जाता हो, लेकिन लोकतंत्र की इस विडंबना का कोई एंड नहीं है।


तारीख: 18.06.2017                                                        अमित शर्मा 






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