एक शुरुवात


[ये कहानी पूर्ण रूप से काल्पनिक है और इसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं। हालाँकि इस कहानी का मुख्य सार तुंगनाथ में घटी एक घटना से लिया गया है पर इसके चरित्र और संवाद पूर्ण रूप से काल्पनिक हैं। कहानी का उद्देश्य मृत्यु की एक अलग परिभाषा देना है ताकि एक स्वरुप में मनुष्य मृत्यु से न डरे।]


"मृत्यु के बाद क्या होता है?"


इस सवाल ने अक्सर मानव जाती को परेशान किया है। हमारे देश में या देश के बाहर कहीं भी किसी दार्शनिक, विद्वान्, ज्ञानी, साधू महात्मा और यहाँ तक की किसी वैज्ञानिक के पास भी इस सवाल का जवाब नहीं है। हमारी महान और समृद्ध संस्कृति में झांक के देखें तो उसमें आत्मा का उल्लेख है।


गीता का ज्ञान हमे ये बताता है कि जीवन का चक्र तो चलता ही रहता है। आत्मा निरंतर कार्यरत रहती है और हम जिस तरह पुराने कपड़े छोड़ कर नए कपड़े पहनते हैं ठीक उसी तरह हमारी आत्मा भी पुराने शरीर को त्याग कर नए शरीर को धारण कर लेती है। पर अफ़सोस इस धारणा को कुछ लोग नहीं मानते जिन्हें हम विज्ञान के अनुयायी के रूप में जानते हैं। उन्हें तो आत्मा के होने या न होने पर भी संदेह है। 


अंतत: समस्या ये हो जाती है कि जिन्हें इस सवाल का जवाब मालूम है वो हमे बता नहीं सकते क्योंकि वो मर चुके हैं, जो कहते हैं कि उन्हे इस सवाल का जवाब मालूम है (परम ज्ञानी साधू महात्मा वग़ैरह) उनपर हम उतना यकीन नहीं करते और जिनपर हम यकीन करते हैं (वैज्ञानिक) उन्हे इस सवाल का जवाब मालूम नहीं है। हम सभी एक वस्तुनिष्ठ और तर्किक (यानि logical) जिन्दगी जीते हैं जिसमें जब तक हमे हर चीज़ का गणित और विज्ञान के तहत प्रमाण न मिल जाए हम उसे नहीं मानते हैं। (और मैं ये नहीं कहता कि उसमे कुछ गलत है)
पर कभी-कभी कुछ ऐसे हादसे होते हैं जो हमारी सोच और समझ के दायरे से बाहर होते हैं। जो इस बात का एह्साह दिलाते हैं कि कोई ताकत तो है जिसके आगे हम सब बहुत निसहाय और कमज़ोर हैं। जो कुछ समय के लिए हमें ये समझाते हैं कि इस जीवनकाल में सत्य समुंद्र की भांति गहरा है और हमारे पास सिर्फ विज्ञान है जो एक बूंद भर की प्यास बुझाता है।


ऐसे ही एक घटना हुई थी कुछ सालों पहले तुंगनाथ की चोटी पर जब तीन दोस्त जीवन, प्रवीन और अक्षय हाईकिंग का शौक लेकर वहां पहुंचे। तुंगनाथ उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड) में ऋषिकेश से जुड़ा हुआ एक दार्शनिक स्थल है। ये ‘पंच केदार’ में से एक है जिसके साथ कई कथाएं जुड़ी है। सबसे चर्चित कथाओं में से एक ये है कि जब पांडवों ने कौरोवों को मार दिया और कुरुक्षेत्र का युद्ध जीत लिया तब श्रीकृष्ण ने उनसे अपने पापों की क्षमा मांगने को कहा। केवल भगवान शिव ही त्रिदेव में से एक थे जो उन्हें उनके पापों से मुक्ति दिला सकते थे। परन्तु शिव या कोई भी देव सृष्टि के विधान को तो नहीं बदल सकता। शिव जानते थे कि पांडवों के किए पापों की उन्हें घोर सज़ा मिलेगी इसलिए वे एक बैल का रूप धारण कर इधर-उधर छुपने लगे। पांडवों ने उन्हें ढूँढना शुरू किया। उन्होंने पूरा भूलोक छान मारा और शिव को शांति नहीं मिल रही थी, उन्हें हर बार दूसरी जगह छुपना पड़ता था। अंत में शिव जी ने अपने शरीर को पांच हिस्सों में बाँट दिया और वो हिस्से पांच अलग स्थान पर बिखर गए।


उन सभी हिस्सों पर पांडवो ने मंदिर बनाए, निरंतर शिव की आराधना की और अपने पापों की क्षमा मांगी। आज वो पाँचों मंदिर ‘पंच केदार’ के नाम से प्रचलित हैं। कहा जाता है कि जिस किसी को भी अपने पापों से मुक्ति पानी होती है वो इन पंच केदार के दर्शन करता है। तुंगनाथ प्रसिद्ध है 'बाहू' अर्थात 'बांह' के लिए। वो स्थान जहाँ शिव के दोनों बांह मिले। तुंगनाथ को अर्जुन ने बनाया था। ऊपर स्थल के मंदिर तक पहुँचने के लिए दो मार्ग हैं एक पहाड़ की चढ़ाई करके और दूसरा पहाड़ पर बने रास्ते पर जीप या गाड़ी-घोड़ा बुक कर चले जाना। 
इन तीन दोस्तों ने लम्बा रास्ता चुना और सोचा कि पहाड़ की चढ़ाई कर के भोलेनाथ के दर्शन करेंगे। उन्हें इश्वर के दर्शन करने में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी जितना की पहाड़ की चढ़ाई करने में। भारत में इससे भी ऊँचे ऊँचे और पहाड़ हैं जिसे कई लोगों ने पार कर लिया है हमारे लिए ये कोई मुश्किल चीज़ नहीं होनी चाहिए, ऐसा सोच कर उन्होंने चढ़ना शुरू किया। तीनो सुबह से ही लगे हुए थे।


हर तरह की तैयारी करने के बाद उन्होंने तुंगनाथ में चढ़ाई शुरू की। सब कुछ बढ़िया चल रहा था कि तभी घाटी के आधे ही रास्ते में जीवन का पैर फिसल गया। उसका पैर फिसला और वो लुढ़कने लगा। उसके चिल्लाने की आवाज़ से अक्षय और प्रवीन रुक गए। शुक्र था कि रस्सी टूटी नहीं और जीवन ने अब तक उसे पकड़ा हुआ था। जीवन पूरी तरह से उल्टा लटका था एक हाँथ में रस्सी की चोटी थी और दुसरे हाँथ में चट्टान का एक हिस्सा। 


प्रवीन ने चिल्लाकर पूछा, "तू ठीक है?"


जीवन ने अपनी सांस को सम्भाल कर हांफते हुए कहा, "हाँ ठीक हुं। बस बाल-बाल बचा।" 


"रस्सी कस के पकड़े रहना और अपने बेल्ट पे ध्यान दे। कदम संभाल के रख साले।"


"हाँ बे समझ गया।" कहकर जीवन ने उनको दिलासा दिलाया कि वो ठीक है।


"तू वहीँ रुक हम नीचे आते हैं।" अक्षय ने कहा।


"नहीं-नहीं यहाँ तक आने की ज़रूरत नहीं। तुमलोग आओगे और बेकार में थक जाओगे।"


"तो तू नीचे चला जा वहां जीप बुक करके हमसे सीधे ऊपर मिलना।" 


"नहीं बीच में आकर मैं नहीं छोडूंगा। मुझे भी ऊपर चढ़ना है।" जीवन ने जिद्द करते हुए कहा। 


"तू बात क्यों नहीं समझ रहा चला जा हम बाद में कभी आ जायेंगे। अभी कुछ हो गया तो?"


"अबे कुछ नहीं होगा, तू टेंशन न ले। बस तुमलोग जब ऊपर पहुँच जाओ तो मुझे खींच लेना।"


उन सब की आवाज़ पूरी घाटी में गूंज रही थी, चिल्ला चिल्ला कर जो बात कर रहे थे। प्रवीन और अक्षय ने बात मान ली और आगे बढ़ चले। जीवन भी धीरे धीरे कदम बढ़ाने लगा।



घाटी छोटी हो या बड़ी उसकी गहराई ज्यादा लगने लगती है जैसे-जैसे आप ऊपर पहुँचते हैं। जीवन भी धीरे धीरे बढ़ रहा था कि तभी एक पानी की बूँद उसके हाँथ पर गिरी, फिर एक और बूँद उसके सर पर, एक और उसके कंधे पर और धीरे धीरे बुँदे बढ़ती गयी। वो समझ पाता उससे पहले ही बारिश की बुँदे उसे भिगोने लगी।


चट्टानी रास्ता और गहरी घाटी में बारिश के वक़्त चढ़ना खतरनाक था। एक हादसा अभी होते-होते बचा, दूसरा भी हो सकता है। उसने ऐसा सोचा और थोड़ी देर रुक गया। जहाँ वो रुका था उसी जगह से लग कर उसे एक गुफा नज़र आई। जीवन हैरान था क्योंकि थोड़ी देर पहले तो ये गुफा यहाँ नहीं थी अभी कैसे आ गयी? हो सकता है ये यहीं थी और उसने ना देखा हो। जीवन ने अपना पैर धीरे-धीरे बढ़ाया और फिर पुरे शरीर को घुमा कर वो गुफा तक पहुँचने लगा। उसने थोड़ा प्रयत्न और किया और गुफा में पहुँच गया।


इस गीली मिटटी में चढ़ाई करना अच्छा नहीं होगा ऐसा सोचकर उसने बारिश थमने तक यहीं रुकने का सोचा। गुफा बड़ी ही सुनसान थी और अँधेरी भी। जीवन के कपड़े भीग चुके थे और ठंडी भी बढ़ने लगी थी। उसने अपनी टी-शर्ट उतार कर रख दिया और अन्दर चला गया। अन्दर घोर अँधेरा था पर दूर एक हल्की रौशनी दिख रही थी। जीवन ने राहत की साँस ली शायद कोई वहां बैठा है। वो धीरे-धीरे उस रौशनी की तरफ बढ़ने लगा।


"वहां कोई है?" उसने ज़ोर से आवाज़ लगायी। कोई जवाब नहीं आया।


जीवन बढ़ता गया। और करीब जाने पर इतना तो समझ में आ गया था कि ये कोई मनुष्य ही है जिसने इस अँधेरी गुफा में रौशनी की है। रौशनी में उसके शरीर की परछाई भी दिखने लगी थी।


करीब पहुँचने पर जो उसने देखा उसको देखकर अगर हम "कलेजा मुँह को आना" मुहावरे का प्रयोग करें तो कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी। वहां कोई इंसान नहीं एक बन्दर बैठा था। वो भी एक दीप की रौशनी में। वहां बैठा कुछ पढ़ रहा था। चुपचाप नहीं मुँह ज़बानी पढ़ कर याद कर रहा था। उसने जीवन को समीप आता महसूस किया तो बस एक बार पलक उठा कर देखा फिर चुपचाप पढ़ने लगा। 


जीवन को मानो साप सुंग गया ये देखकर कि एक बन्दर जिसे इंसान का अविकिसित रूप समझा जाता है वो कुछ पढ़ भी सकता है। पुरे ध्यान से और जोर-जोर से संस्कृत में जैसे कोई श्लोक याद करा रहा हो। जीवन ने हिम्मत की और नीचे रौशनी में देखा तो वो कुछ और नहीं "रामायण" पढ़ रहा था। जीवन की कुछ समझ में नहीं आया और वो वहीँ पास में बैठ कर सुनने लगा। 


रामम् दशरथम् विद्धि माम् विद्धि जनक आत्मजाम् |
अयोध्याम् अटवीम् विद्धि गच्च तात यथा सुखम् || 
ततः सुमन्त्रः काकुत्स्थम् प्रान्जलिर् वाक्यम् अब्रवीत् |
विनीतः विनयज्ञः च मातलिर् वासवम् यथा || 
रथम् आरोह भद्रम् ते राज पुत्र महा यशः |
क्षिप्रम् त्वाम् प्रापयिष्यामि यत्र माम् राम वक्ष्यसि ||


ये कौन से श्लोक थे उसे कुछ समझ में नहीं आया पर जीवन तो मानो ये ही देखकर हैरान था कि ये बन्दर रामायण पढ़े जा रहा है। इनती शुद्ध भाषा में और इस आवाज़ में जैसे इसने पहले कितनी ही बार पढ़ी हो। और भी हैरानी की बात तो ये थी कि वो बन्दर किसी चीज़ से विचलित नहीं हो रहा था। 


जैसे उसने ध्यान ही नहीं दिया कि कोई यहाँ आया है। वो तो बस अपने और अपनी रामायण में मग्न था। अगर आँख खोल कर कोई ध्यान करने की क्रिया होती तो ये कहना गलत नहीं होगा कि वो बन्दर वही कर रहा था। उसने सोचा कि उससे बाहर जाने का रास्ता पूछ ले।
पर वो क्या पूछे एक बन्दर से, "आप मुझे बाहर जाने का रास्ता बता सकते है?" ये भी नहीं पता उसे हिंदी भी आती होगी या नहीं। अगर आती भी होगी तो जवाब आता, "मैं बन्दर हुं, इंसान तुम हो रास्ता ढूँढना तुम्हे खुद आना चाहिए।"


जीवन को तभी कुछ ध्यान आया उसने अपने बैग से एक कैमरा निकाला। कुछ नहीं तो दुनिया को इस अजूबे की तस्वीर तो दिखा ही सकते हैं। उसने एक-एक कर के तस्वीरें खींचनी शुरू की। हर तरफ से, हर दिशा से उसने उस वानर की तस्वीरें खिंची।


हर एक फोटो पर "क्लिक" की आवाज़ होती और 'फ़्लैश' चमकता पर बन्दर अपनी साधना में लगा हुआ था। उसे किसी शोर, मनुष्य, जिव-जंतु या किसी तीसरी चीज़ की परवाह ही नहीं थी। फोटो निकालते वक़्त उसने उस बन्दर को और भी ध्यान से देखा। उसके शरीर पर ढेर सारे बाल थे, जैसा की हर बन्दर के शरीर पर होते हैं पर उसने अपने तन को ढका हुआ था ऐसा तो कोई बन्दर नहीं कर सकता। वो दुबला पतला सा था, हाँथों में कड़ा और कानो में कुंडल थे, चेहरे पर अलग तेज़ था, आँखे बड़ी-बड़ी थी और पुरे बदन में लाल रंग लगा हुआ था। वो एक साधू की मुद्रा में बैठा हुआ था मानो विश्राम कर रहा हो।


वो गुफा श्लोक की आवाज़ से और जीवन की हैरानी से भर गयी थी। कैमरे की रील ख़तम हो गयी (उस वक़्त रील वाले कैमरा प्रचलित थे, डिजिटल नहीं) उसके दिल में इक्छा हो रही थी कि जाते जाते वो कुछ पूछ ले, कोई बात कर ले पर कुछ नहीं कहना ही उसने उचित समझा।


तभी उसका ध्यान गुफा में एकलौते रौशनी के स्त्रोत उस दिए की तरफ गया। वो हिल रहा था। पहले थोड़ा हिला, फिर और थोड़ा और फिर तेज़ी से हिलने लगा। धीरे धीरे उसे ख्याल आया कि वो दीया ही नहीं हर चीज़ हिल रही है। उसने चारो ऒर देखा तो पाया कि गुफा में एक भूकंप आ रहा है। रहा नहीं गया उससे और उसने उस बन्दर से चिल्ला के कहा, "यहाँ क्या हो रहा है?" 


बन्दर ने उसकी तरफ कोई तवज्जो नहीं दिया। वो तो बस अपने में लीन होकर रामायण पढ़ता रहा।


"यहाँ से चलो हम मारे जायेंगे।" फिर कोई जवाब नहीं, बस उसका पढ़ना जारी रहा। 


अंतत: जीवन ने अपनी जान बचाना ज़रूरी समझा और वहां से भाग खड़ा हुआ। अपनी सारी चीज़ें समेटते वक़्त उसने उस बंदर की ओर आखिरी बार देखा तो पाया वो अब भी सिर्फ रामायण पढ़े जा रहा है। बिना रुके बिना किसी भूकंप से विचिलित हुए।


जीवन दौड़ा दौड़ा गुफा के बाहर आया तो देखा बारिश बिलकुल बंद हो चुकी थी। बल्कि सूरज निकल आया था। अन्दर जितना कोलाहल था बाहर उतनी ही शांति। जीवन ने अपना टी-शर्ट उठाया और वहां से चलते बना। थोड़ी ही दूर उसने चढ़ाई की होगी तो उसने सुना।


"ओए कहाँ मर गया था, साले हम सबकी जान निकल गयी थी। कहाँ चला गया था। कुछ हो जाता तो?" प्रवीन और अक्षय उसे देखते ही टूट पड़े उसपर। उसने देखा वो दोनों एक संकरे रास्ते से और भी बहुत लोगों के साथ ट्रैक पर खड़े थे। उसे समझते देर न लगी कि वो सब उसे ढूंढने निकले हैं।


"बारिश शुरू हुई और तू आया नहीं तो तुझे ढूंढने निकले। तू कहीं दिखाई ही नहीं दिया बस तेरा ये टी-शर्ट दिखा तो इसका पिछा किया। तू ठीक तो हैं ना?"


"हाँ ठीक हूँ लेकिन तुम लोग यकीन नहीं करोगे अभी क्या देख कर आ रहा हु मैं।"


"वो सब बाद में अभी तू यहाँ पर आ। अब तू हमारे साथ चलेगा जीप में, बहुत हो गयी ट्रैकिंग।" कहकर अक्षय ने उसे जीप में बिठाया और सब वापस मंदिर की ओर चल पड़े।



जो कुछ होना था हो गया। वो तीनों तुंगनाथ की सबसे ऊँची चोटी पर खड़े थे। भगवान शिव का यहाँ एक विशाल मदिर है। मंदिर में तीनो ने अर्चना की और मंदिर में बैठ कर बातें करने लगे। उन्हें जीवन की किसी भी बात का कोई भरोसा नहीं हो रहा था।


"मैं कह रहा हूँ ना तुमलोग सुनते क्यों नहीं।" जीवन ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा।


"क्या सुने कि तूने एक बन्दर को रामायण पढ़ते देखा। अरे भाई आजकल तो इंसान भी रामायण नहीं पढ़ते और वो भी इस जगह पर बन्दर ढूंढने पर भी नहीं मिलेंगे।"


"नहीं उस गुफा में वो था और वो रामायण न सिर्फ पढ़ रहा था बल्कि याद कर रहा था। मैं खुद हैरान हूँ।"


"ऐसा किसी से मत कहना लोग हँसेंगे।" प्रवीण ने कहा।


"और तो और ये वहां से बाहर कैसे आया, वो सुनो, अचानक वहां भूकंप आ गया।" अक्षय ने बात को मजाक में लेते हुए कहा। "अबे अगर वहां भूकंप आया होता तो सबसे पहले तो पहाड़ के ऊपर झटके लगते न। हमलोग तो ऊपर ही थे हमने तो कुछ महसूस नहीं किया।"


"अरे अब मैं कैसे यकीन दिलाऊ तुमलोगों को। मैंने कैमरे में उसकी तस्वीरें निकली थी पर कैमरा साफ़ करने में दो-तीन दिन लग जायेंगे।"


"जीवन तूने कोई बुरा सपना देखा होगा। वहां ऐसी कोई भी गुफा नहीं है।"


"गुफा कौन सी गुफा?" उन तीन दोस्तों ने ध्यान नहीं दिया पर मंदिर के परम पुजारी वहां से उसी वक़्त गुज़र रहे थे जब उन्होंने उनकी ये बातें सुनी। उन्होंने इस ‘गुफा’ शब्द से चौंकते हुए कहा।


तीनो उठ खड़े हुए। पुजारी जी ने उनसे पूछा, "कैसी गुफा का उल्लेख कर रहे हैं आप लोग?"


जीवन ने पुजारी जी को भी सारा किस्सा कह सुनाया। पुजारी जी ने सब कुछ सुनने के बाद कहा, "उस गुफा को हम पिछले चालीस सालों से ढूंढ़ रहे हैं। उस गुफा को हमारे गुरूजी ने एक बार देखा था। वो कहीं अचानक से प्रकट हो गयी थी और फिर कहीं अचानक से गायब भी हो गयी। जिस तरह सब कुछ धुंधला-धुंधला तुम्हे याद है उसी तरह उन्हें भी याद था। आश्चर्य की बात ये है कि उन्होंने भी एक वानर के बारे में बताया था जो रामायण पढ़ता है। हम सब उस काल से उस गुफा, उसमे बसे वानर और रामायण को ढूंढ़ रहे हैं पर वो हमे नहीं मिला।

कभी नहीं मिला। तुम बहुत किस्मतवाले हो कि तुम्हे ये सब देखने को मिला।" 


"वो है कौन? वानर की शक्ल वाला इंसान है या बन्दर। और रामायण कैसे पढ़ सकता है वो?" प्रवीन ने पूछा।


"वो तो हमे भी नहीं पता। हम उसे ढूंढ़ पाते तो कुछ कह सकते थे। पर वो हमे आज तक नहीं मिला।"


"तो हमे क्या करना चाहिए?"


"कोई क्या कर सकता है, हम सब भी कुछ नहीं कर सकते। एक बात तय है वो कोई बुरा इंसान नहीं, वो इंसान ही नहीं। बस तुम लोग इसके बारे में ज्यादा मत सोचो चुपचाप चले जाओ अपने कमरों में और सो जाओ।" कहकर पुजारी जी वहां से चले गए "राम नाम सत्य है। राम नाम सत्य है।" कहते कहते।


प्रवीन ने पूछा, "ये 'राम नाम सत्य है' तो तब कहते हैं न जब कोई मर जाता है। पर ये पुजारी जी अभी क्यों कह रहे हैं?"


"क्या पता यार ये पुजारी लोग भी पागल ही होते हैं,” अक्षय ने चिढ़ते हुए कहा, “तू मेरी बात सुन जीवन। हम यहाँ कुछ नया करने के लिए आये थे और अब तक जो कुछ भी हुआ वो एक दिन के लिए बहुत ज्यादा नया था। मैं कहता हु इन सब के बारे में सोचना छोड़ के अपने-अपने कमरे में चलते हैं।" 


प्रवीन ने भी कहा, "हाँ यार बहुत हो गया चल अब चलते हैं।" तीनों अपने होटल की ऒर चल दिए। तुंगनाथ में चढ़ाई जितनी मुश्किल थी उतरना उतना ही आसान। तीनों अपने होटल पहुँच कर अपने-अपने कमरे में चले गए। थकान और नींद ने जब अपना असर दिखाया तो मुँह से सिर्फ एक जम्हाई निकली। अक्षय और प्रवीन तो तुरंत सो गए पर जीवन को नींद नहीं आ रही थी। 


उसे सिर्फ इसी बात का ख्याल आ रहा था, "आज क्या हुआ? उसने आज किस चीज़ का सामना किया? क्या वो अपने आपको खुशकिस्मत समझे या बदकिस्मत? ऐसी प्रबल छवी थी उस वानर कि उसे भुलाया नहीं जा सकता था। शायद उसे एक बुरा सपना समझ के भूल जाना ही बेहतर होगा।" सोचकर उसने अपने आँखे बंद कर ली। यकीन था कि अब नींद तो आ ही जाएगी।


सुबह प्रवीन और अक्षय उठ कर जीवन को उठाने की कोशिश कर रहे थे पर जीवन था कि कोई जवाब ही नहीं दे रहा था। न जाने कितनी ही बार उसका नाम चिल्ला चिल्ला कर दोनों थक गए थे पर जीवन उठा नहीं। एक मामूली आदमी को जितनी समझ होती है उसका इस्तेमाल करके प्रवीन ने जीवन की नाड़ी देखी, फिर उसके नाक के नीचे ऊँगली लगा के सांस देखी। जवाब उसके सामने था। जीवन मर चूका था।


कैसे हुआ, कल तक तो अच्छा खासा था, अचानक से मृत्यु कैसे हो सकती है? इतने सवाल थे जिनका जवाब नहीं मिल रहा था। प्रवीन और अक्षय, जीवन के बहुत अच्छे दोस्त थे। इसलिए उन्होंने उसके माता-पिता को फ़ौरन बुला लिया। सबकी आँखे नम थी और जवाब थे कि मिल नहीं रहे थे। जीवन के माँ पिता से क्या कहेंगे? जीवन कैसे मरा "वो सो गया था" वो तो रात में हर कोई सोता है।


जीवन के माता-पिता वहां पहुंचे तो अपने जवान बेटे के शव को देखकर उनकी आँखे थी की रुक नहीं रही थी और जुबान से कुछ बोल नहीं जा रहा था। इस अनहोनी की खबर चोपटा, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग और आस-पास के गाँव में भी फ़ैल गयी। जल्द ही बात तुंगनाथ के मंदिर तक भी पहुंची। ढेरों लोग जमा हुए और जितने लोग उतने सवाल और उतनी कहानियाँ।


जीवन के पिता ने आखिरकार एक बार जोर से प्रवीन और अक्षय से कहा, "सच सच बताओ क्या हुआ था वरना पुलिस को बुला कर तुम लोगों को जेल भिजवा दूंगा।"


"अंकल ऐसा आप सोच भी कैसे सकते हैं। हम जो कह रहे हैं वही सच है हमे नहीं मालुम की क्या हुआ। अगर आपको यकीन नहीं होता तो आप पुजारी जी से पूछ सकते हैं उन्होंने हमे मंदिर से एकसाथ निकलते हुए देखा था।


पुजारी जी वहीँ खड़े थे लोगों की भीड़ में। उन्होंने आगे आते हुए कहा, "श्रीमान मुझे ज्यादा पता नहीं पर मैं कुछ बातें बताना चाहूँगा जो आपके कुछ सवालों का जवाब दे सके। आज से चालीस साल पहले की बात है जब मेरे गुरु इस स्थान पे रहते थे और हम सब उनका अनुसरण करते थे तो उन्होंने एक दिन हम सबको कहा कि मंदिर की चढ़ाई करते वक़्त उन्हें एक गुफा में प्रवेश मिला जिसमे उन्होंने एक वानर को देखा जो रामायण पढ़ रहा था। हम उस दिन से उस गुफा और उस वानर को ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं पर कितनी ही कोशिश की हमने हमे कोई ऐसी गुफा नहीं मिली। हम सबने हार मान ली थी।"


"पर इन सबका मेरे बेटे की मौत से क्या लेना देना?"


"ज़रूरी बात ये है कि जिस दिन गुरूजी ने इस गुफा में वानर को देखा वो दोपहर में अपने विश्राम के लिए गए और उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। नींद में ही।"


पुजारी जी की बात ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया था।


"हम भी उनकी मृत्यु कैसे हुई इस बात का हल ढूंढते रह गए पर कोई उत्तर नहीं मिला। जिस तरह आज जीवन की मृत्यु का उत्तर नहीं मिला।"


"आपके कहने का क्या मतलब है क्या मेरा बेटा इसलिए मर गया क्योकि उसने किसी देव को देख लिया था और उसे मुक्ति मिल गयी।"


"मैं ऐसा तो नहीं कह रहा पर हाँ ये ज़रूर है कि आपके पुत्र का मरना आवश्यक था। ज़रा सोचिए अगर आपकी पत्नी के द्वारा बनाई हुई किसी पकवान का स्वाद हम सब को खाने से पहले ही चल जाए तो शायद आपकी पत्नी वो पकवान दोबारा कभी न बनाए। ठीक उसी प्रकार इश्वर हम तक पहुँचने के बहुत से प्रयास करता है पर हम तभी उससे मिल सकते हैं जब हम उसे समझने के लायक हो जाएँ जब सही वक़्त आये। और सही वक़्त सिर्फ मृत्यु के बाद ही आता है क्योंकि जीवन भर हमारा शरीर तो सदैव पाप और भ्रष्ट आचरण से भरा रहता है। न जाने कितने ही गलत कार्यों का बोझ होता है इस शारीर और मस्तिष्क पर। हम पवित्र तभी होते हैं जब हम अपने आत्मिक रूप में होते हैं। जब सब कुछ सिर्फ एक प्रशन नहीं प्रशन का जवाब होता है। जब सामने सिर्फ प्रकाश ही प्रकाश होता है। तब जाकर हम इश्वर से मिलने के काबिल होते हैं। आपने लोगों को कहते हुए सुना होगा की जीवन एक सफ़र हैं। जी हाँ जीवन एक सफ़र है पर मृत्यु भी एक सफ़र है या यु कहें कि सफ़र की शुरुवात है। आगे का सफ़र तो इससे भी कठिन है। ये एक ऐसी शुरुवात है जो हमे इश्वर से मिलने के काबिल बनाती है।


"इसका मतलब क्या है?"


"मतलब ये है कि आपके पुत्र ने एक यात्रा को समाप्त कर दूसरी यात्रा शुरू कर दी। वो खुशनसीब था कि उसे अपनी शुरुवात करने का मौका जल्द ही मिल गया। ये वक़्त आँसु बहाने का नहीं धीरज रखने का है, खुश होने का है। आपके पुत्र ने गलती से ही सही पर इस मिथ्य जीवन को त्याग दिया। सच कहूँ तो मुझे इर्ष्या हो रही है उससे।"


"और तुम दोनों" पुजारी जी ने प्रवीन और अक्षय की ऒर देखते हुए कहा "व्यर्थ कोशिश मत करना मैं जानता हु कि जीवन ने इस कैमरे से ढेरों तस्वीरें खिंची हैं उस वानर की पर मेरी बात मानो उसमे तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा।"


कहकर पुजारी जी अपने मार्ग में चले गए "राम नाम सत्य है" का जाप करते हुए। सब हैरान थे ये जान कर कि मृत्यु भी एक शुरुवात हो सकती है और तीन दिन बाद जब प्रवीन ने कैमरे की रील साफ़ करवाई तो सच में पूरी रील खाली निकली, फोटोग्राफ़र ने हँसते हुए कैमरा लौटाया और कहा, "घर में बच्चों को कैमरा मत दिया कीजिये।"
 


तारीख: 16.07.2017                                                        प्रिंस तिवारी






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