क्षमा कर दो


["वो इंसान जो दूसरों को क्षमा नहीं कर सकता वो उसी पुल को तोड़ देता है जिसपे उसे एक दिन खुद चलना है। हम सब जीवन में एक न एक बार शर्मिंदा हुए हैं और माफ़ी मांगते हैं। और इंसान जैसा प्राणी तो तब तक क्षमा मांगेगा जब तक ये संसार है।"
                                थॉमस फ़ुलर]


हर रोज़ शाम को आकर खाना बनाना और रवि के साथ बैठ के खाना। मानो जैसे आदत हो गयी थी। पिछले कुछ दिनों से वो नहीं कर पा रही थी तो जी अच्छा ही लग रहा था। मैंने कभी भी अपने आप को एक कम्पेटेटिव (competetive) औरत के रूप में नहीं देखा। मैं एक हाउस वाइफ (house wife) थी और हाउस वाइफ ही ठीक थी जब तक रवि के साथ मेरा तलाक नहीं हुआ। 
मैं उसके बाद से जैसे टूट सी गयी। बहुत कम लोग समझ पायेंगे कि तलाक का दर्द कैसा होता है। ऐसा लगता है मानो हम अब तक किसी झूठे सपने में जी रहे थे और अब! अब जा के आँख खुली है। सपने में पहले 23 साल तो हमे ये बताया गया कि तुम बहुत अनोखे हो, तुम्हारे लिए सफ़ेद घोड़े पे बैठ कर कोई राजकुमार आएगा और तुम्हे हमेशा खुश रखेगा। इस ज़माने में सारी मुश्किलों से बचाएगा और हर दिन ढेर सारा प्यार करेगा।
कुछ दिन के बाद सपनो का राजकुमार आ भी जाता है। दो साल तक वो सारी बातें भी होतीं हैं जिनके बारे में बताया गया था। फिर थोड़ी दिक्कतें आतीं हैं, थोड़े झगड़े होते हैं, एक बात की सौ बातें होती है और एक दिन पता चलता है कि तुम्हारे पति का किसी और के साथ अफेयर (affair) चल रहा है। फिर तो उसे चाहे जितना समझाओ वो मानता ही नहीं और एक दिन तलाक हो जाता है। तब जाकर नींद खुलती है और सपना टूटता है।
मेरी कहानी भी बिलकुल ऐसी ही थी। मैं देहरादून के छोटे से घर में पैदा हुई थी। माँ बाप की तीसरी बेटी, मेरे बाद दो और भी बच्चे हुए एक भाई और एक बहन। झूठ मैं कहना नहीं चाहती इसलिए ये बताती हूँ कि मेरे पिता ने बड़ी मुश्किलों से हम सभी भाई-बहनों को पाला और पढ़ाया था। मैं उनके प्यार और देखभाल के लिए जीवन भर मेहरबान रहूंगी। उसके बाद उम्र के एक पड़ाव में जब सबकी शादी होती है, मेरी भी शादी रवि से हुई।
रवि एक अच्छे इंसान थे और हर तरह से परिवार सम्भालते थे। मुझे कोई बड़ी शिकायत नहीं थी उनसे। पर वो हमेशा एक राज़ बन कर रहे। मुझसे ज्यादा बातें नहीं करते थे। मैंने भी कोई परवाह नहीं की। जब रहने के लिए अच्छा घर है, परिवार में कोई झगड़े नहीं हैं और ज़माने की नज़र में हम दोनों पति पत्नी हैं, तो क्या तकलीफ है? शायद यही मेरी भूल थी।
मुझे पता ही नहीं चला कब रवि मेरे हाँथ से फिसल गए। उन्होंने एक दिन मुझे एक लड़की के बारे में बताया जिसका नाम वो कुछ स्नेहा बता रहे थे। उन्होंने कहा कि मैं उसके जैसी नहीं, मैं थोड़ी ट्रेडिशनल (traditional) हूँ, छोटे कपड़े नहीं पहन सकती, मुझे बड़ी-बड़ी पार्टियों में लेजाकर अपने दोस्तों से मिलवाने में उन्हें शर्म आती है, इस नए-बड़े शहर में बाकियों की तरह नहीं हूँ। सच तो ये है कि उन्हें कभी मुझसे प्यार ही नहीं था। वो तो बस अपनी बिरादरी में शादी करने के लिए उन्होंने मुझसे शादी कर ली। आज उनके पास हिम्मत और पैसा दोनों है कि वो मुझे छोड़ सकें और अपने जैसी खुले विचारों वाली लड़की ‘स्नेहा’ से शादी कर सकें।
जाहिर सी बात है मैंने बहुत समझाने की कोशिश की, झगड़े किए, दलीलें दी पर कोई असर नहीं हुआ। उन्होंने फैसला कर लिया था मुझे छोड़ने का और वैसा हुआ भी। 13 दिसंबर 1999 को हमारा डाइवोर्स (divorce) हो गया। रवि ने बहुत से वादे किए कि मुझे अगर किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तो मैं उनके पास आ जाऊं, शादी के बाद भी वो मेरा ख्याल रखेंगे,अलिमोनी (Alimony) पर मुझे हर महीने 13000 रुपये मिलेंगे (उनकी सैलरी का आधा हिस्सा) पर वो पैसे सिर्फ दो महीने तक आए उसके बाद जब भी मैं गयी तो चौकीदार ने जवाब दिया “साहब और नई मेमसाहब हनीमून पर गए हैं। कुछ दिन के बाद वापस आएंगे।” 


मैंने निराश होकर सोचा ये कैसा हनीमून जो महीनों से ख़त्म ही नहीं हो रहा। मुझे पहले ही समझ लेना चाहिए था वो दोनों कभी वापस नहीं आएंगे। मेरी किसी दोस्त ने कहा,"केस कर दे।" अब मैं कहाँ केस या कोर्ट के चक्कर में पडूँगी? ये सोच कर मैंने सब कुछ छोड़ दिया।
मैं परेशान थी और ऐसे में तो एक ही घर याद आता है। माँ और पापा। मैं जब देहरादून गई तो देखा कि मेरी बड़ी दीदी के हस्बैंड (husband) घर में बैठें है। मेरे दहेज़ में रवि को एक कार मिली और उन्हें उनके दहेज़ में उन्हें सिर्फ एक बुलेट बाइक (bullet bike) इस बात से उन्हें हमेशा मलाल रहा। वो हर दूसरे-तीसरे दिन आकर घर में बैठ जाते थे और पापा को उनके तेवर झेलने पड़ते थे। ऐसा उनके साथ ही नहीं बाकी के सभी दामाद के साथ भी उन्हें झेलना पड़ता था। बेचारे पापा किस-किस का बोझ ढोते। ये सोचकर मैं गेट से ही लौट आई।
आज मैं बिल्कुल अकेली थी। सब कुछ धुंधला लग रहा था। इतना गुस्सा आ रहा था मुझे उस छिनार स्नेहा पे मानो वो मेरे सामने आ जाए तो उसका गला घोंट के हर उस पल का बदला लूँ जब वो मेरे पति के साथ थी। उसके बाद गुस्सा आ रहा था रवि पे। उसे क्या हक़ बनता था मुझे इस तरह छोड़ने का अगर वो सामने आ जाए तो शायद मैं इस वक़्त उसकी पूरी इज्जत उतार दूँ। और सबसे ज्यादा मुझे गुस्सा आ रहा था अपने आप पर क्यों मैंने किसी को मौका ही दिया कि कोई मेरा फायदा उठा सके।


इन सब बातों में अगर किसी की सबसे ज्यादा गलती नज़र आती है तो वो है मेरी। उसी दिन मैंने फैसला कर लिया कि अब मैं किसी को वो मौका नहीं दूंगी कि कोई भी मुझे नुकसान पंहुचा सके। मुझे किसी के चले जाने का दुःख हो ऐसा किसी से लगाव ही नहीं होने दूँगी। मैं इतनी सख्त हो जाऊँगी कि हर तकलीफ और परेशानी को मुझसे टकराकर टूटना पड़ेगा। मैं इस वक़्त अकेली हूँ और अकेली ही रहूंगी क्योंकि आज के बाद मुझे किसी की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। जो शब्द मैंने अपने मन में सोचा वो था इंडिपेंडेंट (independent), अब मैं इंडिपेंडेंट हो जाऊँगी।
मैंने कंप्यूटर में एक कोर्स किया था। बस किसी मीडिया फर्म (media firm) में एक नौकरी मिल गयी इवेंट मेनेजर (event manager) के तौर पे। मैंने थोड़ी मेहनत से काम किया तो एक दिन प्रमोशन (promotion) में अच्छा ऑफिस मिल गया। समय का पहिया दो साल और घुमा तो अपने आपको एडिटर (Editor) की पोस्ट पे पाया। बस उस दिन से मैंने शायद ही किसी से अच्छी तरह से बात की हो। मेरे ऑफिस में आते ही लोग डर जाते थे। किसी भी तरह निरंतर कार्यपर रहने के लिए मैंने अपने से छोटे ओहदे के लोगों को डराना शुरू किया। हर वक़्त उनपर हुक्म चलाना, उनकी अवहेलना करना, उनपर मीटिंग में चिल्लाना और कभी छोटी से छोटी गलती के लिए भी उनकी बात मैनेजमेंट तक पहुँचाना मेरे लिए आम बात थी।
गलतियाँ करने वालों से मुझे सख्त नफरत होने लगी। चपरासी तक पर भी मैंने इस तरह चिल्लाया कि वो वहाँ से चला गया। मेरे बॉस ने जब मुझसे पूछा तो मैंने साफ़ कह दिया,"यहाँ कमज़ोर लोगों की ज़रूरत नहीं है।" उन्होंने पूछा, "कमज़ोर? चपरासी? एक चपरासी कैसे कमज़ोर हो सकता है?" 


"वो हर कोई कमज़ोर है जिसे एक बार में कहने पर बात समझ में नहीं आती, इतनी छोटी सी बात कि मुझे चाय में चीनी कम चाहिए अगर नहीं समझ में आए तो ऐसे लोगों को आप क्या कहेंगे। जब IQ इतना लो (low) है तो ऑफिस में क्या दुनिया में भी लोग जीना मुश्किल कर देंगे।"
"और मेरे बाकी के स्टाफ का क्या? उनमे से 6 लोगों को भी तुमने नोटिस पे रखा है? क्या उनका भी IQ कम है?" 
"Mr. दीपक इस वक़्त मुझे लग रहा है आपका भी IQ कम है। मैंने जब एक बार कहा तो आपकी भी समझ में नहीं आया।"
उन्होंने चिल्लाकर कहा, "तुम मुझसे इस तरह बात नहीं कर सकती, मैं तुम्हारा बॉस (boss) हूँ। और तुम अपनी मन मर्ज़ी भी नहीं चला सकती। अपनी पर्सनल प्रॉब्लम (personal problem) की वजह से किसी भी एम्पलॉय (employee) को जॉब से नहीं निकाला जा सकता है।"


"अगर आपको कोई तकलीफ है तो हम अपने MD से बात कर सकते हैं।" मैंने अहंकार भरे शब्दों में जवाब दिया। मेरा ट्रैक रिकॉर्ड (track record) अच्छा था। कोई MD से बात करे भी तो मेरा नुक्सान नहीं कर सकता था। MD को कोई परवाह नहीं थी, जब तक कि फर्म (firm) को फायदा पहुँचता है और मैंने बीते वर्षों में फर्म का अच्छा फायदा करवाया था। मैं उस दिन से सिर्फ अपनी ताकत में डूब गयी थी। मुझे कोई परवाह नहीं थी किसी के एहसासों की या किसी के चोट लगने की। मैं खुश थी और सुरक्षित थी इतना मेरे लिए काफी था।
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एक दिन हमारी फर्म को एक प्रोडक्शन कंपनी (production company) ने अपने फैशन डिजाइनिंग (fashion designing) के लिए hire किया। मेरी एक ज़रूरी मीटिंग होनी थी उनके डायरेक्टर (director) के साथ। मैंने सब कुछ (जरुरी प्रेजेंटेशन) तैयार किया और उनके घर में पहुँच गयी ये बताने के लिए की हमारी फर्म बहुत अच्छी है और उसमे बहुत से क्रिएटिव (creative) लोग हैं वैगरह वैगरह। जब मैं प्रेजेंटेशन (presentation) देकर वापस आई तो अगले दिन उनके प्रोडक्शन से कॉल आया। उन्होंने कहा, "उन्हें हमारे फर्म से कोई तकलीफ नहीं बस जो एम्प्लोयी प्रेजेंटेशन देने वहाँ आई थी उसका वयव्हार उन्हें अच्छा नहीं लगा। वो काफी rude थी और इसलिए वो आगे हमसे कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं करना चाहते।”
मेरे होश ही उड़ गए। सब लोग मेरे ऊपर झपट पड़े। मेरे बॉस तो मानों मौका देख रहे थे मुझपर ऐसा कोई दावं खेलने का। मुझे कॉल्स (calls) पे कॉल्स आने लगे। जवाब तो देना ही था। मैं ज्यादा डिटेल (detail) में जाना नहीं चाहूँगी बस पूरी बात बताती हूँ। वो एक बड़े प्रोडक्शन की फ़िल्म शूट करने वाले थे और अगर वो हमे काम देते तो शायाद हम इंटरनेशनल हो जाते। वो मौका मेरी वजह से मेरी फर्म के हाँथ से निकल गया। मेरे मैनेजिंग डायरेक्टर ने एक बार फ़ोन कर के मुझसे पूछा,

"वहाँ तुमने क्या किया?"
मैंने अपने आप का बचाव करते हुए कहा, "नहीं मैंने कुछ नहीं कहा। बस अपना प्रेजेंटेशन दिया था।"
"तुमने किसी के साथ बदतमीज़ी की? किसी के ऊपर चिल्लाया?"
मैंने साफ़ कह दिया,"मैंने ऐसा तो कुछ खास नहीं किया बस एक बार उस नौकर को डांटा था।"
"किस नौकर को?”
“वही जो उस चाय लाने वाली बुढ़िया का पक्ष ले रहा था।"
"कौन सी बुढ़िया?"


"अरे वहाँ एक बुढ़िया थी जिसे मैंने एक बार कहा भी कि मेरे लिए चाय बिना चीनी के अलग से लाए, तो वो चाय में चीनी मिला के ले आयी। मैं सच कहती हूँ आजकल के नौकर किसी काम के नहीं होते हैं, उन्हें तो बस घर भेज देना चाहिए।"
दूसरे तरफ से मेरे मैनेजर की दो मिनट तक कोई आवाज़ नहीं आयी। उसके बाद उन्होंने कहा, "राधिका वहाँ कोई बुढ़िया नहीं थी। वो सान्याल जी की दादी थी जिन्हे वो बहुत प्यार करते हैं। उनकी उम्र हो चुकी है और उस वजह से उन्हें थोड़ा कम सुनाई देता है। और जिस नौकर से तुमने बदतमीज़ी की वो उनके घर का नौकर है। बरसों से उनके घर में काम कर रहा है। उसकी उस घर में सान्याल जी से ज्यादा इज्जत है। तुमने बिल्कुल सही कहा आजकल के नौकर किसी काम के नहीं होते हैं उन्हें घर ही भेज देना चाहिए। तुम अपना ऑफिस कल खाली कर घर जा सकती हो। तुम और तुम्हारी चाय। तुम्हारी एक चाय की वजह से हमें करोड़ो का नुकसान हुआ है।"
मैं जब तक समझ पाती उन्होंने अपना फ़ोन पटक दिया था। मैं समझ ही नहीं पायी कि जमीन इतनी जल्दी पैरों से कैसे खिसक गयी। मैंने फ़ोन का रिसीवर (receiver) नीचे रखा तो सर घूम रहा था, साँस तेज़ी से चल रही थी, हाँथ काप रहे थे। जैसे ही मैं ऑफिस के बाहर निकली तो सब अपनी अपनी बत्तिसी दिखा रहे थे। कुछ लोगों को मैंने केक खा के सेलिब्रेट (celebrate) करते हुए भी पाया। 


क्या मैं इतनी बुरी थी कि मेरे चले जाने से लोग खुश हो रहें हैं? किसी को मेरे बारे में ज़रा सी भी सहानिभूति नहीं थी? आज एक बार फिर मैं अकेली पड़ गयी थी। पर ऐसा नहीं होना चाहिए था। पिछली बार जब मैं अकेली हुई थी तो मुझे मेरी गलती पता थी। मैं कमज़ोर थी इसलिए अकेली थी पर आज, आज क्या हुआ? आज तो मैं सख्त भी थी और मज़बूत भी। मैंने किसी को भी अपने करीब नहीं आने दिया था तो आज क्या हो गया? आज मैं निराश क्यों हूँ? तकलीफ और अकेलेपन में मैं चुपचाप अपने घर पहुँची। मेरा अपार्टमेंट भी पूरी तरह खाली था। शाम के साढ़े पाँच हो रहे थे मैं कभी इतनी जल्दी घर नहीं आई। शाम से रात हुई और रात से गहरी रात। जब करने को कुछ न हो तो समय काटना इतना मुश्किल होता है मैंने कभी सोचा नहीं था।
आज एहसास हुआ कि मेरा घर बहुत बड़ा है एक अकेले इंसान के रहने के लिए। भूख भी लगी तो ध्यान आया कि अब कोई है नहीं जिसपे चिल्ला सकूँ। खुद ही उठ कर मैगी बनाकर खाना पड़ा। मैं सोच रही थी कि क्या गलत किया मैंने। अब तक तो करियर (career) भी ठीक ही था। आज अगर किसी दूसरे फर्म में काम मांगने जाऊँगी तो मुझे तो कोई भी काम दे देगा। मेरा रिकॉर्ड जो इतना अच्छा है। कोई परवाह नहीं। तभी ध्यान आया नहीं परवाह है। जब कोई पूछेगा कि पिछली नौकरी से क्यों निकाला गया तो?


जवाब तो स्पष्ट होगा मेरे लैटर पे। Bad behaivour यानि ‘गलत व्यवहार’ या ‘बुरा व्यवहार’। और कोई भी फर्म शायद किसी ऐसे को काम न दे जिसका व्यव्हार बुरा है। मैं सोच-सोच कर ही थक गयी कि आगे क्या करना है। रात से सुबह हुई तो ध्यान आया कि सोना भी है। मैंने सोने के लिए जैसे ही चादर खिंची मेरी दरवाज़े की घंटी बजी। मैंने देखा मेरी पड़ोसन तैयार खड़ी थीं। उन्होंने हमेशा मुझे अपने साथ कहीं घूमने जाने की ज़िद्द की है। वो कहतीं हैं इससे सोशल ओपन-नेस (social openness) बढ़ती है। और मैं हमेशा उसे टाल देती थी ये सोचकर,"वो जिस चिड़िया का भी नाम हो, मुझे उससे क्या करना है?"
आज उन्होंने बहुत ज़िद्द की। उन्होंने बताया कि आज कोई प्रोफेसर निखिल दुबे दिल्ली में अपना लेक्चर देने आ रहे हैं। काफी जाने-माने मनोचिकित्सक हैं। लोग कहतें हैं कि उन्हें जीवन का बहुत ज्ञान है और अनुभव भी। वो सिर्फ विज्ञान और दवाईयों में ही नहीं यकीन नहीं करते। मनुष्य के भीतर छुपे किसी भी वेदना को भी ठीक कर सकते हैं। मैंने सोचा अगर ऐसा है तो अच्छी बात है। मैंने उनके साथ जाने का निश्चय किया। जब मैं वहाँ पहुँची तो प्रोफेसर दुबे ने काफी वैज्ञानिक तरीके से सभी बातों का उल्लेख किया।


हर तरह के लोग जो अपने जीवन में, अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में किन बातों का ख्याल नहीं रखतें जिससे वो खुश नहीं हैं उनके बारे में बताया। अंत के दस मिनट उन्होंने एक विशेष विषय पर बात की "क्या करें जब सब रास्ते बंद हो चुके हों?" ऐसा विषय मेरे लिए रोचनीय था। मैंने ध्यान से सुनना शुरू किया। सत्य ही था मैं उस एक घंटे के दिए लेक्चर से काफी प्रभावित हुई। इतना तो समझ में आ गया कि इस वक़्त कोई मेरी समस्या का समाधान कर सकता है तो वो यही हैं।
मैंने लेक्चर के बाद उनसे कुछ समय के लिए अकेले में बात की। उन्हें अपनी सारी समस्या बताई। सब कुछ गौर से सुनने के बाद उन्होंने कहा,"श्रीमती आप बहुत तकलीफ में हैं। आपको अपने जीवन को नियंत्रण में करना सीखना होगा और सबसे पहले क्षमा कर दो।"


मैं इसका तात्पर्य समझ नहीं पायी। क्षमा कर दो? किसको? सान्याल जी के घर बदतमीज़ी मैंने की है क्षमा मुझे मांगनी चाहिए। मैं किसीको कैसे क्षमा कर सकती हूँ। मैंने उनसे पूछा भी, तो उन्होंने जवाब दिया, "ये आप खुद ढूंढ सकती हैं।" और वो वहाँ से चलते बने।


मैं थक हार कर फिर से घर आई। कुछ समझ में आए न आए। ये बात तो समझ में आ गयी थी कि गलती मेरी थी। तो मुझे एक बार माफ़ी भी मांगनी चाहिए थी। मालूम था कि इससे नौकरी नहीं मिलेगी पर मेरे ह्रदय का भार तो कम हो जाएगा। सोचकर मैं सान्याल जी के घर जा पहुँची और उनकी दादी एवं नौकर से क्षमा मांगी। उनका दिल बड़ा था अतः मेरी हालत देखकर उन्होंने मुझे क्षमा कर दिया। मैं जब घर आई तो इसी सोच में थी कि मुझे किसे क्षमा करना है? ये प्रोफेसर ने क्या कहा?
तभी सहसा एक ख्याल आया। मैंने अपना कंप्यूटर ऑन किया, ईमेल खोला और कॉन्टेक्ट् (contacts) में रवि और स्नेहा को ढूंढा। पुरे छे साल हो गए थे उन्हें देखे। पता नहीं यही ईमेल-आईडी है या बदल दी है। मैंने रवि को एक मेल लिखा "हेल्लो रवि पता नहीं इतने सालों बाद मेरी बात सुनके तुम क्या सोचो। पर कुछ है जो मैं तुमसे कहना चाहती थी लेकिन समय नहीं मिल पाया, तो सोचा अब कह दूँ। तुमने मुझे जब से छोड़ा और मेरे अकेले होने के बाद मैंने इंडिपेंडेंट काम करना शुरू किया, मुझे एक तरह की नयी शक्ति और स्फूर्ति मिली है। तुम दिल्ली छोड़ कर चले गए। पता नहीं क्यों पर अगर मेरे डर से गए हो ये सोचकर कि ना जाने कब मेरे दरवाज़े पे मेरी आधी जायदाद लेने पहुँच जाए तो तुम्हे डरने की ज़रूरत नहीं। मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए। मैं बस तुम्हे ये बताना चाहती थी कि मैंने तुम्हे माफ़ किया। तुम मेरे लिए अब कुछ मायने नहीं रखते। मेरी जीवन की अभी जो भी अवस्था है तुम उसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हो। मैं खुद हूँ। मैंने तुम्हे क्षमा किया।"


कुछ इसी तरह का मेल मैंने स्नेहा को किया, "स्नेहा, तुम्हारी वजह से मेरा घर टुटा। पर अब समय आ गया है कि हमे अपने अतीत को हमारे वर्तमान पर अधिक हावी नहीं होने देना चाहिए। मेरे दिल में तुम्हारे लिए कोई मलाल नहीं। नहीं जानती कि तुम्हे सुनके कैसा लगेगा पर मैंने तुम्हे क्षमा किया।" यही दो इंसान थे मेरे जीवन में जिन्हे मुझे क्षमा करना था। वो मैंने कर दिया। दो दिन हुए होंगे और मुझे एक मेल आया रवि और स्नेहा का। वो इस वक़्त पुणे में हैं और अच्छे हैं। उन्हें मेरा हाल जानकार बहुत दुःख हुआ और वो मुझे अपनी पूरी सहानुभूति देते हैं। उन्होंने कहा कि मेरे उस मेल को पढ़कर उन्हें बहुत अच्छा लगा। उन्हें अच्छा लगा ये जानकर कि मैंने उन्हें माफ़ किया और मेरे मन में उनके लिए कोई मलाल नहीं है। वो हर भरसक कोशिश करेंगे मेरी मदद करने की।


बस कुछ ही दिन हुए होंगे ऐसा करके कि मेरे घर के टेलीफोन की घंटी बजी। मेरे ऑफिस से फ़ोन था उन्होंने कहा कि सान्याल साहब ने तय कर लिया है कि उन्हें मेरे साथ काम करने में कोई तकलीफ नहीं। उल्टा वो मेरी तारीफ़ कर रहे थे। उन्होंने मुझे ऑफिस वापस बुलाया है। मैं खुश हुई और ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगी। तभी मुझे कुछ ध्यान आया। मैंने रूककर अपनी डायरी के आखरी पन्ने पे अपना नाम लिखा और लिखना शुरू किया, "जब से अपने अतीत के हादसे को दिल से तुमने लगाया। तुम्हे ये सोचने की फ़ुरसत नहीं मिली कि कितना बदल दिया तुमने अपने आप को इस दुनायबी भाग दौड़ में।
तुम ऐसी नहीं थी बस तुमने सोच लिया कि कोई भी तुमसा नहीं होगा इसलिए हर किसी को तकलीफ पहुँचाने लगी। इतना सब हुआ सिर्फ एक गलत आदमी से गलत शादी की वजह से। किसी भी डिग्री या ट्रैक रिकॉर्ड से बढ़ कर होता है इंसानियत और मानवता का रिकॉर्ड। राधिका जो कुछ भी हुआ मैंने उसके लिए तुम्हे माफ़ किया। मैंने अपने आपको माफ़ किया। चाहे कितने ही मुश्किलों का सामना करना पड़े, कितने ही गलत लोगों से सामना हो मैं अपने आप को नहीं बदुलंगी।" लिखने के बाद जब मैंने उसे पढ़ा तो समझ में आया कि प्रोफेसर साहब वाकई में मुझे किसे क्षमा करने को कह रहे थे। वो मुझे अपने आप को क्षमा करने को कह रहे थे।


उस पन्ने को मोड़कर मैं अपने साथ ले गयी। उस दिन मानो जैसे चमत्कार ही हो गया। जब किसी ने मेरी बात को नहीं समझा तो मैंने उसपे चिल्लाने के बजाय शांति से समझाने का प्रयत्न किया। किसी भी मनुष्य के साथ सयंम और धीरज से काम लिया। सभी को अपने समान समझा और किसी पर हुक्म चलाने के बजाय उनसे अनुग्रह किया। उस दिन मानो जैसे सबने मुझे किसी दूसरी ही नज़र से देखा। ऑफिस में लोगों के बीच काना फूसी शुरू हो गयी। लोग हैरान थे और खुश भी। उस दिन जिस तरह का सम्मान मुझे मिला मैं सोच भी नहीं सकती थी। शायद मैं अब तक गलत थी। शायद ये दुनिया मुझ जैसे ही लोगों से भरी है। मुझ जैसे ही लोग जो चोट खाए हुए हैं, तकलीफ में हैं और किसी न किसी तरह के दुःख से गुज़र रहे हैं। बस मैंने ही नहीं देखा। ज़रूरत है इनसे सदभावना दिखाने की न की इनपे धौंस जमाने की। किसी ने कहा है “आप भले तो जग भला और आप बुरे तो……।”
उस दिन मैंने पहली बार इंडिपेंडेंट शब्द का सही अर्थ समझा। इंडिपेंडेंट का अर्थ सारे कामों को अपने सर पर लादकर उन्हें अकेले करने की कोशिश करना नहीं होता। इंडिपेंडेंट का अर्थ सभी कामों को करना परन्तु अपने अस्त्तिव को खोये बैगर। मैं आज पहली बार इंडिपेंडेंट महसूस कर रही थी। जल्द ही मुझे प्रमोशन भी मिल गया और वो भी मेरे अच्छे व्यवहार के लिए। (मुझे आज भी यकीन नहीं होता)
ये सब हुआ सिर्फ अपने आप को क्षमा करने से। मैं आज दिल्ली के एक गुलमोहर फ्लैट में रहती हूँ। करियर अच्छा है। दुबारा शादी करने की कभी ज़रुरत नहीं पड़ी। एक समय आया जब मुझे लगा कि मैंने जो सीखा है वो मैं किसी और को भी सीखा सकती हूँ। मुझमे आज भी इतना प्यार बचा है कि किसी और को भी दे सकूँ। आज से आठ साल पहले मुझे एक फूल सी बच्ची दिखायी दी। मैंने उस बच्ची को गोद लिया और हाँ मैं हर रोज़ अपने दिन की शुरुवात उस नन्ही मुस्कान को देख कर और अपने आप को लिखे हुए उस ख़त को एक बार पढ़ कर करती हूँ जिसमे मैंने अपने आपको क्षमा किया था।

 


तारीख: 31.07.2019                                                        प्रिंस तिवारी






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