कुछ अधूरे ख़्वाब

आधी रात का वक्त, पूरे चाँद की रात, समुन्दर के किनारे चलते चलते, समय का कुछ पता ही नहीं चला. लहरों के साथ भीगते भीगते काफी दूर निकल आई. पता नहीं कितने छोटे बड़े ख्याल दिमाग की गहराइयों में अपना वजूद तलाशने लगे. कुछ अच्छे और कुछ बुरे भी, याद आया बचपन का वो घर, जहाँ आँगन में इसी चांदनी के नीचे, गर्मियों की अनगिनत रातें गुज़रीं, नानी के किस्से कहानियों से भरपूर. 

जहाँ रात होते ही आम के पेड़ के पत्तों से छन कर चांदनी पूरे आँगन में बिखर जाती थी, उसके साथ ही शुरू होता बादलों से आँख मिचोली का खेल, जो पूरी रात चलता, और मैं चाँद के बादलों से निकलने का इंतज़ार करते करते पता नहीं कब गहरी नींद में सो जाती, बिलकुल बेफिक्र. अनगिनत तारों के बीच एक अकेले चाँद का एक अलग ही महत्व होता था. 

फिर याद आये, लड़कपन की वो अल्हड़ रातें, जब पूरे चाँद की रातों में, करवटें बदलते यूँ ही रात बीत जाया करती थी, आँखों में नींद कहाँ होती, होते थे तो बस न जाने कितने सपने, और उन्हीं सपनों के पीछे भागती मेरी नींद भी कहीं गायब हो जाती थी. अब तो कुछ ठीक से याद भी नहीं, पर उनमें से कुछ सपने पूरे हुए और कुछ अधूरे ही रह गए. पर उन पलों में खुद से की हुई कहसमकश आज भी मन के किसी कोने में अंकित है.

आज फिर पूरनमासी की रात है, समुन्दर की मदमस्त लहरें उछल उछल कर अपने चाँद को छूने की नाकाम कोशिश कर रही हैं, ये जानते हुए भी की वो कितनी भी कोशिश कर लें, सफल नहीं हो सकतीं. कितना अजीब रिश्ता है न इन लहरों का चाँद से, बिलकुल उन अधूरे सपनों की तरह जो पूरे नहीं हो सकने पर भी अपने अधूरेपन से ही कहीं न कहीं हमें पूरा करते हैं. हमारी ज़िन्दगी का एक अटूट हिस्सा बन हमें आगे बढ़ने का हौसला देने का काम भलीभांति करते हैं. ज़िन्दगी में सारे सपने कहाँ ही पूरे होते हैं भला, रह जाती है तो बस हमारी स्मृतियों पर उनकी अमिट छाप, एक अधखिली मुस्कान बन. 


तारीख: 08.06.2017                                                        आस्था कौशिक






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