माँ और मैं

"फिर से कद्दू की सब्ज़ी?"

मैंने बड़े गुस्से में पूछा. माँ ने थकी हुई आवाज़ में जवाब दिया, बेटा आज भर खा लो, कल पक्का तुम्हारी मन पसंद सब्ज़ी बनेगी, पर मैं ठहरी महा ज़िद्दी, मैं भला क्यों मां की बात मानने लगी, गुस्से में प्लेट पटकते हुए उठ खड़ी हुई. गुस्सा तो जैसे सातवें आसमान पर जा चूका था. 

भाग कर अपने कमरे में जा छुपी. मां ने आकर मनाने की कोशिश की. कई बार बुलाया, पहले प्यार से, फिर थोड़ा डांट कर, फिर रो कर. पर मैं कहाँ सुनने वाली थी. माँ के ऊपर बड़ा गुस्सा आया, लगा, माँ ने आज मुझसे पूछे बिना कैसे सब्ज़ी बना दी. पता नहीं कब तक माँ दरवाज़े पर इंतज़ार करती रही. मुझे न जाने कब नींद आ गयी. 

सुबह होते होते मैं रात की बात भूल गयी. रसोई में देखा तो मां ने मेरा मन पसंद नाश्ता बनाया था, लगा काफी सुबह से तयारी कर रही थी, मुझे बड़ी ख़ुशी हुई और मैं माँ से जा के लिपट गयी, लिपटी तो देखा मां का शरीर बुखार में तप रहा था. शायद मां ने भी रात में खाना नहीं खाया था, मां कभी मुझे बिना खिलाए खाती कहाँ थी. मुझे ही ये बात याद न रही, गुस्से में. 

अचानक बड़ा अफ़सोस हुआ, पता चला दो दिन से मां की तबियत ख़राब थी, पर मुझे अपनी धुन में कुछ पता ही नहीं चला और न ही मां ने कुछ बताया. मां ये सब बातें कहाँ बताती थी, पर मेरे बीमार पड़ने से पहले ही मां को पूर्वाभाष हो जाता. कुछ देर तक मां से लिपटी यही सोचने लगी.

अब अपने देश और मां से इतनी दूर जब भी बीमार पड़ती हूँ, तब अनायास ही वो यादें आँखों के सामने आ जाती हैं. वही लौकी की बेस्वाद सब्ज़ी, दुनिया के सबसे बेहतरीन रेस्तरां के खाने को भी पीछे छोड़ देती है. कई बार बिलकुल वैसी ही सब्ज़ी खाने का दिल होता है जिसे देख बचपन में मैं पूरा घर सर पर उठा लेती थी, पर शायद अब वो नसीब में नहीं. यहाँ न तो कोई वैसे सब्ज़ी बनाने वाला है और न ही उसे न खाने पर डांटने वाला. कोई बात नहीं, आज ही मां को फ़ोन कर बोलूंगी जब मैं घर आऊं तो, ठीक वैसे ही फीकी सी सब्ज़ी बनाने , बिलकुल उसी प्यार और अपनेपन से.


तारीख: 08.06.2016                                                        आस्था कौशिक






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