पाटील का कुत्ता


                    
                    शेरा को कल रात नौ बजे के लगभग अंतिम बार पाटील वाडे में देखा गया था। पिछले पंधरा सालों से वाडे में काम करनेवाले नौकर तुका ने उसे अपने हाथों से खाना दिया था, जिसे उसने बडे अनमने ढंग से देखा था। शेरा ने खाना खाया था या नहीं इस प्रश्न का उत्तर तुका भी नही दे पा रहा था, शायद उसका खाना या ना खाना तुका के लिये उतना महत्वपुर्ण नही था जितना संभाजीराव पाटील के लिये था।


                               संभाजीराव गाँव के सरपंच थे, उनकी मर्जी के बिना गाँव में पत्ता नहीं हीलता था, वैसे वो हीलने भी नही देते थे। गाँव में छोटे से लेकर बडे तक सभों को उनका आदर करना पडता। गाँव का कोई भी काम बिना उनके पूरा नहीं हो सकता था, शिवाजी जंयती हो या गणेशोत्सव वे पूरे तन,मन और ज्यादा से ज्यादा धन के साथ हिस्सा लेते। गाँव के लोगों को प्रसन्न करने का वे कोई अवसर हाथ से ना जाने देते, आखिर इन्हीं लोगों को सीढी बनाकर वे अगले वर्ष विधायक की कुर्सी तक पहूँचने वाले थे। 


                   पूर्वजो और राजनीति की कृपा से धन की कोई कमी नहीं थी। ऐश्वर्य का घर में वास था। पाटील कम पढे-लिखे थे, पर शिक्षा का राजनीति में क्या काम ? वे अल्प ज्ञान और अधिक बल के द्वारा पिछले बीस वर्षो से उसगाँव में राज कर रहे थे। धन की अधिकता से शौक के पौधे उगते है। पाटील ने भी ऐसे कई पौघे उगा रखे थे। राजनीति के सिलसिले में शहर आना जाना लगा रहता था, शहरी नेताओं को देखकर उन जैसा रहन-सहन, शौक अपनाने की नाकाम कोशिश वे कर चूके थे।


                 गाँव के बुढे बताते थे की पाटील के पूर्वज शेर पाला करते थे। बेचारे संभाजीराव, शासन की सख्ती और शेरों की घटती संख्या के कारण शेर तो नहीं पाल पाये, हाँ एक विदेशी कुत्ता मँगवा कर उसी का नाम ‘शेरा’ रख लिया। ये कुत्ता भी शहरी नेताओ की नकल का ही फल था। पाटील जब भी किसी शहरी नेता के घर जाते उनके कुत्ते को देखकर नेता की ओर आकर्षित हो जाते। इसी आकर्षण का विदेशी फल ‘शेरा’ कल रात नौ बजे से गायब था।  


            शेरा एक शानदार कद-काठी वाला कत्थई रंग का अल्सेशियन कुत्ता था। जिसे पाटील ने अपनी सहुलीयत के लिये “अॅलिस” कर दिया था। अल्सेशियन कहने का जोखिम वो एक-दो बार उठा चुके थे, और असफल होते होते रह गये थे। दोनो बार तुका ने उन्हें बचा लिया था, जो मेट्रिक पास होते ही पाटील की चाकरी करने झोंक दिया गया था, और पुरे उसगाँव में शेरा की देखरेख के लिये सबसे योग्य    

पुरुष था। नासिक से शेरा को लाने के लिये तुका भी पाटील के साथ गया था। शेरा के ही कारण तुका को उस भव्य गाड़ी में बैठने का मौका मिला था, जिसे वो अब तक केवल धो-पोंछ सकता था।
        
             तीन माह पहले जब शेरा आया था उस दिन वाड़े में दिपावली जैसी रौनक थी। पाटलीन बाई ने अपने हाथों से शेरा की आरती उतारकर पाटील को तिलक लगाया था। इस गृहप्रवेश का साक्षी बनने सारा गाँव आया था। गाँव के वृध्द लोग जो अपनी आयु से कई ज्यादा पुराने थे वे भी अपना आर्शिवाद लेकर पहुँचे थे। कुछ शिक्षीत युवा जिनकी संख्या गाँव में बहोत कम थी और पढ-लिखकर भी जिन्होंने गाँव नहीं छोड़ा था (जिसका कारण मिट्टी की ममता थी उनका आलस्य नहीं।) वे भी अपनी बुध्दी का प्रयोग शेरा और उसकी नस्ल की तारीफ करने के लीये कर रहे थे। गाँव का एकमात्र स्कुल जो सरकारी अनूदान के ऑक्सिजन पर जिवीत था, आज उसके सभी विधार्थी पाटील वाड़े में जमा थे वे भी शेरा का स्वागत करने आये थे। आखीर वो गाँव के पाटील का कुत्ता था।


        शेरा के आने से पाटील के प्रतिष्ठा तो बढ़ी ही थी, उनकी दिनचर्या भी जो पहले सरकारी कर्मचारीयों की सी थी अब किसी नौकरी ढुँढने वाले युवा की तरह हो गई थी। वे रोज़ सुबह जल्दी उठकर शेरा को घूमाने ले जाते, तुका भी उनके साथ होता। वे बड़ी शान से उसे गाँव की गलियों का परिचय करवाते। मोती,कालू,भूरया,लालू और गाँव के ऐसे कई आवारा कुत्ते जिन्हें कोई नाम भी नसीब नहीं हुआ था वे बड़े आश्चर्य और प्रशंसा के भाव से शेरा को देखते। कालू और लालू ने तो शेरा को देखकर भौंका भी था, पूँछ के नीचे सूँघने की चेष्टा भी की थी जिसे तुका ने असफल कर दिया था। ‘रानी’ जो पाटील के एकमात्र प्रतिद्वंदी जाधव की कुतिया थी, उसी की तुलना शेरा से हो सकती थी।बाकी सारे कुत्ते तो ट्रेन की जनरल बोगी के यात्रीयों के समान थे, एकदम सामान्य। तुका को सख्त हिदायत दी गई थी की इन आवारा कुत्तों को शेरा के आसपास भी फटकने ना दिया जाये।


        व्यस्त दिनचर्या के कारण पाटील शामको शेरा को घुमाने नहीं ले जा पाते। यह भार अकेले तुका को उठाना पड़ता। इसी बहाने तुका को भी उस विशाल और लगातार बढ़ते हुए पाटील वाड़े से बाहर निकलने का मौका मिल जाता। गर्मी की शामें कुछ ज्यादा ही बड़ी होती है। इन्हीं शामों में तुका उन सख्त हिदायतों को अनदेखा कर, शेरा को उन आवारा कुत्तों के पास ले जाता। पहले-पहल शेरा को इतने पास देखकर वे घबराए,पर जब उन्हें पता चला की यह भयावहता, यह विराट शरीर केवल दिखाने के दाँत है तो उनका ड़र जाता रहा। अब वे सारे सज़ातीय प्राणी एक साथ खेलते,गुर्राते,मस्ती करते। फिर भी शेरा उन आवारा कुत्तों के मध्य ऐसा लगता, जैसे सरकारी स्कुल के विधार्थीयों के बीच इंग्लिश कॉन्व्हेंट का बच्चा।
      

           गर्मी खत्म होते-होते ये मित्रता प्रगाढ़ हो गई थी। तुका जब शेरा को वापिस लाता तो सारे कुत्ते उसे पाटील वाड़े तक छोड़ने आते। इस समुह में जाधव की कुतिया रानी भी होती। शेरा भी उदास मन और बोझील कदमों से वाड़े की तरफ लौटता, यही दशा तुका की भी होती।पर सुबह जब पाटील शेरा को घूमाने ले जाते तो यही सारे मित्र औपचारिकता के दायरे में रहकर बर्ताव करते। ना वे आवारा कुत्ते शेरा के पास आते ना उसे देखते। तुका जानवरों की ईस बुद्धीमानी को देखकर हैरान रह जाता। जानवर भी इंसान पहचानते थे।
                बारिश का मौसम इन मित्र-मंडली के लिये काल बनकर आया। जुन लगते ही बारिश का दौर शुरु हुआ और ऐसा शुरु हुआ की जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया। शेरा का घुमना-फिरना भी बंद था, मतलब अब वो अपने मित्रों से नहीं मील सकता था। शेरा तो यहाँ अपने विशेष कक्ष में सुरक्षित था पर वो बेचारे आवारा कुत्ते बारिश की मार झेल रहे थे। बंद गाड़ियों के नीचे,दुकानों के नीचे वे अपनी दुम मुँह में दबाये बैठे रहते। शेरा भी बैचेनी से उन्हें याद करता।


           बारिश थम गई थी पीछे अपने अवशेष जगह-जगह पानी से भरे गड्ढे छोड़ गई थी।शेरा को बारिश की बीमारियों से बचाव का टीका लगवाने नासिक ले जाना था। पाटील की कार में बैठकर शेरा जब गाँव की सड़क से निकला तब अपने मित्र को देखकर गाँव के वे आवारा कुत्ते कुछ दुरी तक कार का पीछा करते रहें। अपने मित्रों के इस समुह को देखकर (जो पहले से काफी छोटा दिख रहा था जिसके कुछ सदस्य नदारद थे) शेरा भी खुद को रोक नहीं पाया और पहली बार पाटील के सामने वो उन कुत्तों  को देखकर भोंकने लगा। पाटील भय और विस्मय का मिश्रित भाव लिये कभी शेरा कभी तुका की और देखने लगे। तुका जानबुझकर पाटील को अनदेखा कर शेरा को चुप कराने की नाकाम कोशिश करता रहा। कार सड़क का पानी उड़ाते हुए तेज़ी से बढ़ी जा रही थी।


            शेरा शाम से ही विचीत्र व्यवहार कर रहा था। बेवज़ह भौंक रहा था, गले से बँधी चैन खींच रहा था, उसे तोड़ने की कोशिश कर रहा था, खाने का बरतन पलटा दिया था, वो बेचैन और उग्र लग रहा था। वाड़े के सभी सदस्य शेरा के इस व्यवहार से चकित थे। पाटील इसे टीके का असर समझ रहें थे। तुका कोने में खड़ा असहाय भाव से शेरा को निहार रहा था। दोनों की नज़रे मिलते ही शेरा शांत होकर बैठ गया। सामने के दोनों पाँवो को लंबाकर उसमें अपना सिर रखकर दया के भाव से तुका को देखने लगा। उन ड़बड़बाई गिली आँखों ने तुका को अंदर तक हिला दिया था। जीवन में पहली बार तुका अपने मन से कुछ करने की सोच रहा था।
                   

             सुबह पाटील शेरा को देखने गए वो गायब था। तुका किसी काम में व्यस्त था उसे बुलाया गया। सवाल-ज़वाब,तर्क-वितर्क का दौर शुरु हुआ। वाड़े का कोना-कोना छाना गया। शेरा कहीं नहीं था। कल शाम शेरा के विचित्र व्यवहार को इस घटना से जोडकर देखा जा रहा था। किसी अनहोनी की आशंका से वाड़े के कुँए में तक पाटील झाँक आए थे। अब शेरा को गाँव को में ढ़ुँढने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। पाटील तुका को साथ लेकर निकल पड़े।


                    गाँव में आते ही पाटील ने देखा की कुछ दुरी पर एक छोटी सी भीड़ आनंद और आश्चर्य के साथ कुछ देख रहीं है। पाटील को देखकर उस भीड़ में से कुछ लोग मुस्कुराने लगे। उन लोगों की मुस्कुराहट में आज भय का भाव नहीं था, पाटील ने इस बात पर गौर किया। पर आज गौर करने का एक ही विषय था, शेरा जो कल रात से लापता था। पाटील उस भीड़ को चीरकर जैसे ही सामने आए, उनकी आँखो ने वो दृश्य देखा जिसकी वो कल्पना भी नहीं कर सकते थे। एक निचली ज़गह में बारिश का पानी जमा था, जो अक्सर गरिब बच्चों के लीए निसर्ग निर्मीत स्विमींग पुल होता है। उसी गंदे,मटमैले पानी में गाँव के सामान्य आवारा कुत्तों के साथ उनका विशेष विदेशी शेरा खेल रहा था। वे सब कीचड़ से सने थे, वे दौड़ रहें थे, एक दुसरे पर गिर रहें थे, एक दुसरे को दाँतों से सहला रहे थे। शेरा के निजी एवं विशेष होने का चिन्ह उसके गले का वो लाल पट्टा, अब गाँव की मिट्टी के रंग में रंगकर मटमैला हो गया था। वे सारे सज़ातीय प्राणी अब एक से लग रहें थे। शेरा के इस रुप को देखकर पाटील चकित हो गए, वे भी अपनी हँसी नहीं रोक पाए। ये सच्ची हँसी थी ईमानदारी की हँसी।
                 पाटील तुका के खांदे पर हाथ रखकर, हल्की सी मुस्कान के साथ उसे देखकर चले गए। इस मुस्कान का अर्थ तुका समझ नही पाया, पर पाटील सब समझ गए थे। पाटील के उस विदेशी कुत्ते ने गाँव को अपना लिया था। पाटील का कुत्ता अब गाँव का कुत्ता बन गया था, वो गाँव की मिट्टी से ज़ुड़ गया था, गाँव अब पाटील से भी यही उम्मीद कर रहा था.....


 
                    
 


तारीख: 27.08.2017                                                        प्रमोद मोगरे






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है