विष रहित

अम्मा आँख मून्दे बरामदे मे एक खटिया पर पड़ी थीं। बरामदे की दीवारें तो अग्नि वर्षा कर ही रही थी, बाहर से आने वाली हवा भी मानो गुब्बारों में आग भर भर के अम्मा के शरीर पर मारे जा रही थी । गर्मी से परेशान अम्मा अपनी बाहों से आँखो को ढके सोने की कोशिश कर रही थी ।

छोटू के पिताजी के चल बसने के बाद से अम्मा पाई- पाई की मोहताज हो गयी थी। कई दिनो तक बिजली का बिल ना भर पाने के कारण घर मे बिजली का तार काट दिया गया था। काम चलाने के लिए अम्मा राजू की दुकान से एक बेटरी ले आई थी जिस से सुबह शाम रोशनी की ज़रूरत पूरी हो जाती थी।

ऐसी ही अनेक चिंतायों की बदौलत अम्मा के माथे पर झुर्रियों ने वक़्त से पहले हमला बोल दिया था । शरीर भी वक़्त के साथ कमजोर हो चला था। पर अम्मा का गोरा रंग और चेहरे की गढ़न देख कर सब यही कहते की जवानी में तो अम्मा किसी रेखा या हेमा से कम ना लगती होंगी। 

अम्मा एक गहरे सागर की तरह थीं, बाहर से तो अत्यंत ही स्थिर और सुलझी हुई नज़र आती थी पर अपने मन के भीतर हज़ारों पहेलियाँ लिए घूमती थी, कुछ सुलझी कुछ उनसुलझी। निद्रा की गहरी झील मे अम्मा गोते लगाने ही जा रही थी की अचानक एक गेंद हिचकोले खाते हुए उनके पैरों से आ लगी और अम्मा चौंक कर उठ बैठी। अभी अम्मा कुछ समझ भी ना पाई थी की तीन किशोर बालक अम्मा के छोटे से घर का द्वार खोलकर घर मे घुस आए। एक अम्मा से गेंद वापस कर् देने की दरख़्वास्त करने लगा तो बाकी दोनो गेंद ढूँदने मे लग गये।

अम्मा अभी इस वारदात को कुछ- कुछ समझने की कोशिश कर ही रही थीं कि इतनी देर मे बच्चों ने गेंद ढूँढ निकाली, और तीनों ने बाहर की ओर दौड़ लगा ली। अम्मा अब तक सारी वारदात समझ चुकी थीं। जाते- जाते एक बच्चे ने पीछे मुड़कर अम्मा की ओर देखा और ज़ोर से चिल्लाया, अम्मा!! “माफ़ कर दो, अगली बार नही होगा”। 

गुस्सा तो अम्मा को बहुत आया था पर प्रीत से भरी अम्मा लड़के के चेहरे की शिकन देखकर अपने आप को रोक ना पाई और मुस्कुरा कर बोली “अच्छा चलो माफ़ किया, अगली बार से ध्यान रखना”। पर अम्मा की यह बात सुन ने के लिए बालक रुका ही नही था. अम्मा भी देख रही थी की बालक जा चुका है। शायद अम्मा ने ये लफ़्ज उस बालक के लिए नहीं, खुद के लिए ही कहे थे। अब नींद तो आने से रही थी, अम्मा ने घड़े में से एक ग्लास पानी निकाला औरआकर खटिया पर बैठ गयी। 

छोटू, अम्मा का अकेला बेटा था । मृत्यूशय्या पर पड़े जब छोटू के पिताजी अम्मा को इशारा कर चुके थे, कि वो अब और दिनों तक अम्मा का साथ नहीं दे पाएँगे, तो अम्मा ने चीख- चीख कर कहा था “इस कठोर पर्वत सी निर्मम जिंदगी मई अकेले कैसे कातूंगी? मुझे और छोटू को अकेला छोड़ कर मत जाओ”। 

इसपर छोटू के पिताजी ने भी यही उत्तर दिया था, “तू दिल छोटा ना कर पगली ,अभी तो तुझे बहुत साल जीना है, छोटू को पढ़ा लिखा कर अच्छा आदमी बनाना है। मेरी तरह उसे शराबी और जुवारी ना बनने देना, वादा तो किया था तुझसे पर जिंदगी भर तेरा साथ ना निभा पाया, माफ़ कर दे, अगली बार ना होगा”।

अम्मा को छोटू के पिताजी पर बहुत कम बार तरस आता था। पर उस दिन उनके चेहरे की लाचारी देख कर ना जाने क्यूँ अम्मा का जी भर आया था और ज़ुबाँ से ये शब्द निकले थे “ अच्छा चलो माफ़ किया, पर अगली बार से ध्यान रखना, दारू और बीड़ी दोनो एकद्ूम बंद”। ये बात और है की उस दिन भी अम्मा की माफी सुनी ना जा सकी थी, क्युन्कि सुन ने वाला इस लोक के ही द्वार से बाहर दौड़ गया था।

जब पहली बार छोटू के पिताजी ने लालटेन टूट जाने पर अम्मा को पास रखा पीढ़ा दे मारा था तब भी यही बोले थे , “ माफ़ कर दो, अगली बार ना होगा”। पर अम्मा माफ़ कर पाई भी थी या नही ये जान ने की ज़रूरत उन्हे उस दिन भी महसूस ना हुई थी। 

मारा तो एक बार अम्मा के बड़े भैया ने भी था, बात उन दिनों की थी जब अम्मा जवान थीं, खूबसूरत तो थी ही, बाज़ार से सामान ले कर आते- आते देरी हो गयी थी तो कुछ मनचलों ने उन्हे भरे बाज़ार मे छेड़ दिया था। भैया आगबबूला हो गये थे, अब बाबूला है तो फूटेगा तो है ही, कही और जाता तो शायद फोड़ दिए जाने का डर था, सो अम्मा पर ही फूट पड़ा। और फूटा भी यूँ की अपने साथ- साथ अम्मा के एक कान से सुन ने की शक्ति भी ले गया। उस पर भी माँ के बहुत डाटने पर भैया ने अम्मा से यही कहा था”माफ़ कर दो, अगली बार से नहीं होगा”।

पूरानी बातें याद करते- करते अम्मा के सीने मे अजीब सा दर्द होने लगा था. अम्मा पानी भरे ग्लास को अधरों से लगाने ही जा रही थीं की उतनी देर मे छोटू आ गया। छोटू का चेहरा उतरा हुआ था। वो चुप-चापआकर अम्मा के पास बैठ गया और बोला, 

"अम्मा, आज भारत मॅच हार गया"। 

"तो इसमें तू क्यूँ दुखी होता है खेल में तो हार जीत लगी ही रहती है" । 

"अरे अम्मा, मैने 1000 रुपये की शर्त लगाई थी भारत के पक्ष मे। अब ट्यूशन की फीस भरने के लिए मुझे तुमसे और 1000 रुपये चाहिए होंगे"

"क्या? ऐसा क्यू किया तूने? तुझे पता है मैं वो पैसे मालिक से उधार माँग कर लाई थी"। 

अम्मा के सीने का दर्द कुछ और ज़ोर हो चला था। अम्मा उच्च रक्त-चाप की मरीज़ थीं। पर छोटू भी क्या करे घर की परेशानियों को देखता है तो वो भी पैसे कमाने के छोटे रास्ते ढूंढता है। उसने मुँह फेर कर अम्मा से कहा “अच्छा माफ़ कर दो, अगली बार से नही होगा”।

आज अम्मा ने दिमाग़ मे ठान लिया था कि माफ़ नही करेंगी पर दिल था कि मानता ही नही था। इसी दौरान दिल और दिमाग़ के बीच कुछ ऐसा द्वंद हुआ कि अम्मा अपनी जिंदगी ही हार गयीं। और उस दिन भी अम्मा का जवाब कोई ना सुन सका।

अम्मा सब को माफ़ कर देती थी, जानती थी कि “क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसका क्या जो दंतहीन विष रहित विनीत सरल हो”। 

फिर भी माफ़ कर देती थी, तो क्या अम्मा दंतहीन विष रहित भुजंगों मे से थी, या फिर शायद वो भुजंगो की प्रजाति से थी ही नही, उनकी प्रजाति की अपनी एक अलग व्याख्या होती है, जिसकी कसौटी पर बस अम्मा जैसे कुछ लोग ही खरे उतर पाते हैं।

 


तारीख: 09.06.2017                                                         प्रीतिका सिंह  






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