वो अंधेरी सर्द रात

वह अंधेरी सर्द रात थी । मलुवा उस सर्द रात में भागे चला जा रहा था जैसे मौत उसका पीछा कर रही हो ।उसके चेहरे पर खून जमा देने वाली ठंड होने के बावजूद माथे से पसीना ऐसे बह रहा था मानों जैसे ज्येष्ठ की तपती धूप में किसी किसान के तन से मेहनत का पसीना बहता है । यहां तक मेरी कलम मलुवा के दोस्त अब्दुल के अंधे होने के कारण उसके एहसासों को बयां करती है और उसके बाद आगे की कहानी की शुरुआत करती है ।


             मलुवा अब्दुल के पास एक पल के लिए ही तो रुका था और अब्दुल के गले लगा था । अब्दुल ने महसूस किया मलुवा के गले मिलकर मलुवा का दिल जोर जोर से धड़क रहा था । अब्दुल ने पूछा मलुवा भाई इतनी घबराहटों से गिरकर तेज गति से कहां भागे जा रहे हो ?क्या मृत्यु तुम्हारा पीछा कर रही है ? मलुवा ने घबराकर तुरंत जवाब दिया चलते-चलते "हां अब्दुल भाई मृत्यु ही मेरा पीछा कर रही है । इस परी जैसी दिखती मासूम बच्ची का जीवन हरने के लिए । परी कौन परी और तुम्हें कहां मिली, कब मिली अब्दुल ने आदि प्रश्न मलुवा से जाते हुए किए ? मलुवा ने जाते हुए बस यही कहा कि मित्र जल्दी है । इस बच्ची को डॉक्टर के इलाज की सख्त जरूरत है । तुम्हारे प्रश्नों का जवाब में अभी नहीं दे सकता हूँ । माफ करना ।  मैं महसूस कर सकता था उसके तेज कदमों की आहट । मैं अंधा होते हुए भी यह देख सकता था मलुवा उस घनघोर सर्द रात में मेरे एहसासों से ओझल हो गया । मैं किसी अनहोनी के डर से कांप गया और मलुवा के साथ बीते हुए पलों में खोकर अतीत के पन्नों को पढ़ने लगा । मलुवा मुझ अंधे भिखारी का एकमात्र सहारा था ।

उससे मेरी प्रेम भरी मुलाकात मुझे मेरे अपनों के द्वारा ठुकराए जाने के बाद शिरडी गांव में कुछ दिन पहले हुई थी । जिस दिन हम दोनों की मुलाकात हुई उस दिन से मलुवा मेरा खेवनहार बन गया । शायद वह भी मेरी तरह किसी सहारे की तलाश में भटक रहा था । उसने बताया उसे भी बूढ़ा हो जाने के कारण बोझ समझकर अपनों ने ठुकरा दिया था । हम दोनों उस दिन से साथ - साथ रहने लगे । ईश्वर के नाम पर भक्तों से अन्नदान मांग कर हम दोनों अपना गुजर-बसर करने लगे । दिन भर हम एक साथ रहते । अपना सुख - दुख बांटते । सिर्फ रात भर के लिए हम अलग होते । मुझको मलुवा अल्लाह की शरण में छोड़ कर शाम को स्वयं शिव के मंदिर में सोने चला जाता था । 
          मैं मलुवा के साथ गुजरे पलों को याद कर ही रहा था कि इतने में अचानक एक शर्द हवा के झोंके ने मुझे आकर झकझोर दिया और झकझोर कर मुझसे कहा !अब्दुल लगता है तेरा दोस्त मलुवा मुश्किल में है और तू यहां बैठ कर क्या सोच रहा है ? ख्यालों में खोया है । क्या यही दोस्ती का सच्चा धर्म है । मैं अपने अंदर उस समय एक अलग ही तरह के विचारों से लड़ रहा था । लेकिन मैं कर भी क्या सकता था ? क्योंकि मैं अंधा था । बेबस और लाचार था । मैं अपने मित्र मलुवा की क्या मदद कर सकता था । मैं उस सर्द हवा के झोंके का जवाब नहीं दे पाया और अपनी लाचारी से निराश होकर शांति से शांत मन से अल्लाह से दुआ करने लगा कि मेरे खेवनहार मलुवा और उस नन्ही परी की हिफाज़त करना । नन्नी परी जिसको मुझे अपनी गोद में लेकर लाड़-प्यार  करने का और उसके कोमल शरीर को स्पर्श करने का भी सौभाग्य नहीं मिला है उसकी सलामती के लिए मेरी दुआ कबूल करना और मुझे मंजिल दिखाने वाले मलुवा को उस नन्नी परी का जीवन बचाने के लिए हौंसला देना ।


            उस अंधेरी सर्द रात समय लगभग 2:00 बज रहे थे । मैं गहरी नींद में सो रहा था । अचानक खिड़की दरवाजों को चीरती हुई हवा के झोंके के साथ ठंड से 
कंपकपाती एक तेज आवाज आई डॉक्टर साहब ! डॉक्टर साहब । उस तेज आवाज से मेरी गहरी नींद खुल गई और मैं उठ कर बैठ गया और सोचने लगा इतनी सर्द रात में कौन हो सकता है । फिर मुझे मन ने आभास कराया कि डॉक्टर के पास मरीज आते हैं । शायद कोई मरीज बीमार हो सकता है । मैंने ऐसा सोचा ही था कि इतने में एक तेज आवाज ओर आई । उस आवाज में मुझे लगा जैसे साहस अपना दम तोड़ रहा हो । डॉक्टर साहब मेरी परी को बचा लीजिए नहीं तो यह मासूम परी मर जाएगी । मैंने महसूस किया उस आवाज में दर्द, प्रेम, मजबूरी, लाचारी जैसे एक साथ निकली हो । परी के नाम से मैंने अंदाजा लगा लिया था कि कोई बच्ची बीमार है और उसका नाम परी है । यही सोचते हुए मैंने जल्दी-जल्दी दरवाजे की ओर अपने कदम बढ़ा दिए । दरवाजा खोलते ही मुझे एक बूढ़ा नजर आया । उम्र लगभग 75 वर्ष के करीब रही होगी । उस बूढ़े की आंखों से अश्रुओं  की धारा बह रही थी । शरीर ठंड से कांप रहा था ।

 

उसके माथे से पसीना ऐसे बह रहा था मानो वह मैराथन की दौड़ लगाकर आया हो । इससे पहले कि मैं बूढ़े बाबा के ओर अंगों पर नजर डालता उससे पहले ही उन्होंने चंद घंटों पहले ही पैदा हुई एक नन्ही सी बच्ची मेरे हाथों में थमा दी और यह कहते-कहते बेहोश हो गए डॉक्टर साहब मेरी नन्ही मासूम परी को बचा लेना । इसका जीवन मेरे लिए अनमोल है । बूढ़े बाबा बेहोश हो चुके थे । नन्नी परी मेरी गोद में थी । परी को मैंने प्रेम भरी नजरों से देखा यक़ीनन में वह नन्ही सी मासूम परी 'परियों की रानी कहने योग्य थी । उसके चेहरे पर मासूमियत का प्रकाश ऐसे जगमगा रहा था मानो चांद मेरी गोद में उतर आया हो । लेकिन फिर ध्यान आया है कि परी का इलाज करना है । परंतु उस वक्त मेरे सामने एक समस्या अपना मुंह बांहे खड़ी थी किसका इलाज पहले करूँ । मासूम परी का जिसको ठंड लगने के साथ-साथ निमोनिया भी हो गया था और एक पल की देरी उसकी जान ले सकती थी । उसकी मासूम कोमल धड़कने शीघ्र ईलाज के बिना कभी भी बंद हो सकती थी । या उन बूढ़े बाबा का इलाज पहले करूं जो इस कड़कड़ाती सर्द रात में न जाने  कितनी दूर से अपनी जान की परवाह नहीं करते हुए इस अनजान मासूम बच्ची की जान बचाने के लिए मेरे पास ईलाज के लिए लाए हैं । अनजान का ख्याल मेरे मन में इसलिए आया क्योंकि यह मासूम बच्ची जिसका नाम बूढ़े बाबा परी पुकार रहे थे बूूढ़े बाबा की नहीं थी । परी के तन के कपड़े गर्म कंबल इसी ओर इशारा कर रहे थे कि वह आज रात लोक लाज के डर से या कन्या दहेज का बोझ है यह सोचकर कहीं फेंक दी गई हो और इन बूढ़े बाबा को मिल गई हो । थोड़ी देर बाद मैंने फैसला कि मुझे पहले मासूम सी परी का इलाज करना है न कि बूढ़े बाबा का । उस पल मेरे अंदर लालच अपना घर बना चुका था ।

 

मैं उस पल मैं यह सोचने लगा था कि बूढ़े बाबा अगर मर भी गए तो क्या हुआ मैं इस बच्ची को पिता बनकर पाल लूंगा । परी कौन सा इन बूढ़े बाबा की अपनी औलाद है । मैं इसे अपनी औलाद से बढ़कर प्यार करूंगा । मैं बरसों से बेऔलाद एक औलाद के लिए तरस भी तो रहा था । 15 साल बीत जाने के बाद भी मैंने औलाद का सुख नहीं भोगा था कि औलाद का सुख क्या होता है । आज परी के मिलने से मेरे सारे ख्वाब पूरे होते हुए दिखाई देने लगे थे । मैंने गलत भी क्या सोचा था ? नन्हीं मासूम परी जिसने अपने जीवन के चंद घंटों का ही अनुभव किया था । जिसकी कोमल आंखें अपनी पहली सुबह को सलाम करने इंतजार में हो । इस मासूम परी को उस मां ने दूध पिलाया भी है या नहीं जो जन्म के तुरंत बाद बच्चे को पिलाया जाता है ?  किस निर्दयी क्रूर मां ने इस बच्ची को ऐसी सर्द रात में मजबूर तड़पते हुए छोड़ दिया ? इस बच्ची को तो मौत से भी बड़ी सजा मिली है । काश इसकी निर्दयी मां इसे पैदा होते ही मार देती तो यह मासूम अबोध बच्ची इस सर्द रात में बेबस, लाचार तड़प कर मरने की कगार पर ने पहुंचती । इन बूढ़े बाबा ने भी तो इस बच्ची की जान बचाने के लिए इतना कष्ट उठाया है । वैसे भी बूढ़े बाबा अपने जीवन में कितने बसंत देख चुके हैं यह उनकी उम्र बयां कर रही थी । बूढ़े बाबा को कुछ भी हो जाए मैंने यह सोचकर रामू अपने नौकर को आवाज लगाई रामू उठो और उठकर इन बूढ़े बाबा को घर के अंदर लाकर बिस्तर में लिटाओ और अपने हाथों से मालिश कर इन बूढ़े बाबा का शरीर गर्म करने की कोशिश करो । मैं इन बूढ़े बाबा की जान परी की जिंदगी बचाने का प्रयास करता हूं ।

 

मैं ऐसा कहकर रामू से परी की जिंदगी बचाने की कोशिश करने लगा । रामू जल्दी से उठ कर उन बड़े बाबा को अपनी गोद में उठाकर घर के अंदर ले आया और गर्म कंबल ओढ़ाकर उनकी मालिश करने लगा । मेरा डाक्टरी कर्तव्य लालच के अधीन होने के बावजूद भी ये दुआ करने के लिए मुझे मजबूर कर रहा था कि बूढ़े बाबा भी ठीक हो जाएं । वह कहने लगा कि लालच मत कर बूढ़े बाबा और परी के ठीक हो जाने के बाद परी को बूढ़े बाबा से ही जो मांग लेना । वह साधु हैं,गरीब हैं । परी का लालन - पालन नहीं कर पाएंगे । मैं यह सोचते - सोचते परी के इलाज में खुश होकर मशगूल  हो गया और परी को इंजेक्शन लगाकर उसका मुलायम कोमल शरीर गर्म करने लगा । काफी मशक्कत के बाद इंजेक्शन लगाने के आधे घंटे बाद ईश्वर की कृपा से परी ने बता दिया कि वह हिम्मत की , साहस की मिसाल बनकर दिखाएगी । और कुछ ही पलों बाद रात के सन्नाटे को चीरकर परी के अद्भुत साहस के रूप में उसकी मधुर - मधुर , धीमे-धीमे रोने की आवाज आने लगी । उसके    नन्हे - मुन्ने हाथ-पैर हरकत करने लगे । उसके धीमे-धीमे रोने की आवाज धीरे - धीरे तेज होने लगी और कुछ देर बाद ही मेरा कमरा परी के रोने की आवाज से गूंजने लगा ।

 

मैं तुरंत समझ गया कि परी को भूख लगी है । मैं खुश था मैंने परियों की रानी परी को मौत के मुंह से बचा लिया था । अब परी खतरे से बाहर है यह सोच मैंने निश्चिंत होकर रामू को बाबा की मालिश छोड़ परी के पीने योग्य दूध गर्म करके लाने को कहा । अब मैं बेफिक्र था । मैं अब बूढ़े बाबा का भी इलाज कर सकता था । उनकी बूढ़ी जान बचाने का प्रयत्न कर सकता था । मैंने यह सोच कर परी को वहीं बूढ़े बाबा के पास गर्म कपड़ों में लेटा दिया । परी भूख लगने के कारण जोर जोर से रो रही थी । बूढ़े बाबा को मैंने 2 इंजेक्शन लगाए । बूढ़े बाबा के शरीर पर मास नाम मात्र के लिए ही था । ठंड लगने के कारण उनका शरीर अकड़ गया था । मैंने इलाज तो कर दिया था बूढ़े बाबा का परंतु ईश्वर ही उन्हें जीवनदान दे सकता था । सुबह होने में अभी ढाई, तीन  घंटे का समय था । मैं बुढ़े बाबा के ठीक होने और उनके होश में आने का इंतजार करने लगा तथा रामू को तेज आवाज लगा दूध जल्दी से लाने के लिए कहा ।

 

क्योंकि परी ने भूख लगने के कारण पूरा घर अपने सर पर उठा लिया था । मैं रामू के दूध लाने के इंतजार में बैठा ही था कि मुझे आभास हुआ कि बूढ़े बाबा को भी धीरे - धीरे होश आने लगा है । जैसे - जैसे बूढ़े बाबा को होश आ रहा था धीरे-धीरे परी, परी, मेरी परी शब्दों के नाम का गुंजन बढ़ता जा रहा था । मैं खुश था, आनन्दित था ये देख कि बुढ़े बाबा को भी होश आ रहा है और दुखी भी था कि परी अब मुझसे दूर हो जाएगी । जिस परी के एक पल के साथ ने मुझे ये एहसास कराया कि बाप क्या होता है ? औलाद क्या होती है ? औलाद के लिए बाप का प्यार क्या होता है ?  इन बूढ़े बाबा के होश में आते ही परी मुझे फिर अकेला छोड़ कर चली जाएगी । मेरे सारे ख्वाब तोड़ जाएगी । मैं यह सोच ही रहा था कि इतने में मुझे किसी ने झकझोर दिया । वो बूढ़े बाबा थे । वह मुझे झकझोर कर रोने लगे और पूछने लगे कि मेरी परी कहां है ? वह ठीक तो है ना डॉक्टर साहब ? मैं एक पल के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ होकर बूढ़े बाबा की ओर निहारने लगा । उनकी निस्वार्थ प्रेम भक्ति उनके साहस के बारे में सोचने लगा कि यह कैसा प्रेम है जो परी के अपने थे उन्होंने उसे इस सर्द रात में मरने के लिए छोड़ दिया और यह अनजान बूढ़े बाबा इस परी को अपनी परी अपनी परी कह रहे हैं । परी जोर - जोर से रो तो रही थी । बूढ़े बाबा को एक पल भी नहीं लगा होगा मुझे छोड़ कर रोती हुई परी को अपनी गोद में उठाने में । बूढ़े बाबा पागलों की तरह परी को चूमने लगे, प्यार करने लगे और कहने लगे मेरी परियों की रानी चुप हो जा । तेरे बूढ़े बाबा काल को इतनी आसानी से तेरे प्राण हरने नहीं देंगे । मैं बूढ़े बाबा के परी के प्रति प्रेम को देखकर उस पर मंत्रमुग्ध हो चुका था । ऐसा लग रहा था मानों बूढ़े बाबा उस पल परी की मां बन गए हों । क्योंकि जो परी भूख लगने के कारण जोर - जोर से रो रही थी वह बूढ़े बाबा की गोद में जाकर बिल्कुल शांत होकर आराम फरमा रही थी जैसे उसे भूख लगी ही न हो । 
लीजिए साहब दूध । रामू गर्म करके दूध ले आया था ।


लो बाबा दूध मैंने रामू से दूध लेकर बूढ़े बाबा को दूध देते हुए कहा बाबा यह दूध परी को पिला दीजिए । परी को भूख लगी है । बूढ़े बाबा ने मुझसे दूध लेकर परी को पिलाया ही था मुझे यकीन हो गया कि परी ने पैदा होने के बाद से जल भी नहीं पिया होगा है । वह शीघ्र ही  अपनी क्षमता के अनुसार दूध पीकर , शांत होकर इधर-उधर , अपनी छोटी-छोटी कोमल आंखों से देखने लगी ।मैं यह देख हतप्रभ रह गया कि परी को भूख भी लगी थी और वह कुछ देर पहले रो भी रही थी एवं दूध पीने से पहले वह बाबा की गोद में जाकर शांत शांत ऐसे हो गई जैसे उसे भूख लगी ही न हो ।  वह बाबा की गोद में ऐसे आराम फरमा रही थी जैसे वह बूढ़े बाबा की गोद उसके लिए ईश्वर की गोद बन गई हो । मैंने इतनी शांति का अनुभव अभी तक अपने जीवन में कभी नहीं किया था जितनी शांति का अनुभव मैं उस पल महसूस कर रहा था । बाबा ने भी थोड़ा दूध पीकर बाकी का दूध रामू को थमा दिया और परी को निहारने लगे । बाबा आप कौन हैं ? आपका नाम क्या है ? और ये नन्नी परी कौन है और आपको कहां मिली ? आदि प्रश्न शांति को भंग करके मैंने बूढ़े बाबा से पूछ डालें और शांत हो गया । बूढ़े बाबा ने प्रेम भरी नजरों से मुझे देख कर कहा मलुवा है मेरा नाम डॉक्टर साहब ।

मैं यहां से 15 मील दूर शिरडी गांव में एक शिव मंदिर में रहता हूं । भक्तों से अन्नदान मांग कर अपनी गुजर-बसर करता हूं और यह परी मुझे ! यह कहकर बाबा चुप हो गए । बाबा परी के शीश पर अपना प्रेम भरा, ममता भरा हाथ फेरकर कुछ देर के बाद बोले डॉक्टर साहब यह मासूम, असहाय, लाचार ,अबोध बच्ची मुझे इस सर्द रात में तड़पते हुए, रोते हुए जीर्णोधार माता मंदिर के पास झाड़ियों में पड़ी मिली । इसका परी जैसा सुंदर नाम मैंने इसके परियो जैसे रूप को देख कर रख दिया था । न जाने कौन स्त्री जाति को कलंकित करने वाली मां इस नन्ही सी अबोध बच्ची को इस सर्द रात में मरने के लिए छोड़ कर चली गई  । लेकिन मारने वाले से पहले ईश्वर के दूत बचाने पहुंच जाते हैं ।

 

जैसे मैं परी को बचाने पहुंच गया । ईश्वर की कृपा से परी बच भी गई । बूढ़े बाबा की बातें मुझको ऐसा महसूस करा रही थी उस पल जैसे ईश्वर अपनी जुबान से स्वयं बोल रहा हो । लेकिन बाबा क्या आपको विश्वास था कि आप इन बूढ़ी हड्डियों के सहारे 15 मील दूर चलकर इस सर्द रात में परी को मेरे पास लाकर उसकी जान बचा लेंगे ? मैंने बाबा को बीच में रोकते हुए बाबा से प्रश्न किया । बाबा ने कुछ देर सोचा और बोले मैं दिन भर का थका हारा अपने अंधे दोस्त अब्दुल को मस्जिद में छोड़कर और स्वयं इस सर्द रात में शिव मंदिर में जाकर सोने की कोशिश कर रहा था । इतने में अचानक रात के सन्नाटे को चीरती हुई ठंड के झोंकों के साथ किसी बच्चे के रोने की आवाज आई । मैंने उस पल सोचा हो सकता है ये मेरा वहम है और मैं दोबारा सोने की कोशिश करने लगा । वैसे भी इस घने जंगल में इतनी सर्द रात में कौन आएगा अपने बच्चे को लेकर । मैं ऐसा सोच सोने की कोशिश कर ही रहा था कि रोने की आवाज तेज और तेज आने लगी । मैं उठ कर बैठ गया और सोचने लगा इस सर्द रात में जाऊं या नहीं जाऊं रोने की आवाज के पास ? मैं  दिन भर का थका हारा अपने बूढ़े कदम उठा भी सकूंगा या नहीं ? फिर शायद उसकी मां भी उसके साथ हो जो बच्चे को चुप न  करा पा रही हो और हो सकता है कुछ देर बाद उसकी मां उसको अपना दूध पिला कर शांत करा दे ।

 

मैं यह सोच अपने कदमों को थाम कर फिर से सोने की कोशिश करने लगा बिना इसका अंदाजा लगाएं कि वहां पर कोई बच्चा अकेला भी हो सकता है । और शायद उसके साथ उसकी मां भी नहीं हो और जो इस ठंड में एक पल की देरी से दम तोड़ सकता है ।  मैं सोने की जितनी कोशिश कर रहा था उस बच्चे के रोने की आवाज मुझको उतना ही बेचैन कर रही थी । कुछ समय बीत जाने पर जब बच्चे के रोने की आवाज बंद नहीं हुई तो मुझसे रहा नहीं गया और मैंने अपनी बूढ़ी हड्डियों को आदेश दिया एवं अपने कदम मैंने तेजी से उस ओर बढ़ा दिए जिस ओर से बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी । जितना मैं उस आवाज के नजदीक पहुंच रहा था वह आवाज ओर तेज होकर मेरे कानों को सुनाई दे रही थी । कोई शक्ति मेरे कदमों को हिम्मत साहस दे रही थी । शायद बूढ़े कदमों को भी विश्वास था कि रोने की आवाज कहां से आ रही है । मेरे कदम वहीं जाकर थमे जहां से बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी । मेरे कदम जब मंजिल के पास पहुंचे तो उनको वहां एक नन्ही अबोध बच्ची तड़पते हुए इस कंबल में लिपटी मिली ।  मेरे हाथों ने देरी किए बिना उस  मासूम बच्ची को अपनी छाती से लगा लिया और अपने फटे कंबल से ढक कर उसका शरीर गर्म करने लगा ।

 

मेरे मन से उस पल यही निकला रो मत मेरी परी । मैं तुझे कुछ नहीं होने दूंगा । मैं बूढ़ा यह जानते हुए भी कि मेरी जिंदगी कुछ दिन की मेहमान है मैं परी के भविष्य के बारे में सोचने लगा । परी के शरीर की मालिश करते हुए उसके ख्यालों में खोकर पालने, खिलाने ,पढ़ाने के बारे में सोचने लगा । मैंने महसूस किया था परी को उठाने से पहले इतनी ठंड के बावजूद उसका शरीर गर्म था । उसके शरीर पर केवल यह कंबल ही लिपटा हुआ था । इसका मतलब था डॉक्टर साहब परी को पैदा हुए कुछ ही समय हुआ था । नहीं तो इतनी ठंड में कोई बच्चा तो क्या बड़ा इंसान मरे न भी तो बेहोश जरूर हो जाता । फिर इतनी ठंड में यह बच्ची कैसे जिंदा बच गई इसका उत्तर तो डॉक्टर साहब मैं अभी तक नहीं खोज आया हूं । मैं परी के साहस, उसकी पुकार के बारे में सोच रहा था तभी मैंने महसूस किया कि परी ने रोना तो बंद कर ही दिया है साथ में अपनी आंखें भी बंद कर ली हैं । मैं डर गया और परी को झकझोर कर उठाने का प्रयत्न करने लगा ।  उस पर मेरे झकझोरने का कोई असर नहीं हुआ । मेरा दिल होनी के डर से कांपने लगा ।  सोचने लगा कि कहीं परी मेरी देरी के कारण मर तो नहीं गई । जिस परी के लिए मैंने अभी-अभी ख्वाब सजाए थे उसके ऐसे मेरी गोद में शांत हो जाने से वह सारे ख्वाब टूटते दिखाई देने लगे । मेरा दिल ईश्वर से दुआ करने लगा कि है ईश्वर इस मासूम परी को कुछ नहीं करना । इसकी कोमल धड़कने बंद मत करना । मैंने प्रार्थना कर ईश्वर से आस की किरण के रूप में कि परी को आप बचा लेंगे डॉक्टर साहब मेरे बूढ़े कदमों ने तुम्हारे अस्पताल की ओर कदम बढ़ा दिए और अस्पताल से पता पूछकर मैं तुम्हारे घर पहुंच गया ।  डॉक्टर साहब जो आशा की किरण मेरे मन में जली थी उस किरण को आपने बुझने नहीं दिया । आपने इस नन्ही परी का जीवन बचा कर इस बूढ़े का जीवन सार्थक कर दिया ।  

 

डॉक्टर साहब दो गुजारिश और हैं आपसे इस बूढ़े की । पहली ये कि आप इस मासूम नन्ही परी को अपनी बेटी बना कर पालेंगे । बूढ़े बाबा ने जब यह कहा कि तुम परी को अपनी बेटी बना कर पालोगे मेर रोम - रोम पानी - पानी हो गया । मेरा मन आत्मग्लानि से भर गया । मेरे मन ने लालच के अधीन होकर कितना गलत सोचा । जो इंसान मेरी परी - मेरी परी कहते हुए मेरे पास आया था वही आज परी को मेरी बेटी बनाकर मुझे सौंप रहा है । मेरे घर के सूने आंगन को परी जैसा सुंदर फूल दे रहा है । ऐसा कोई महान इंसान ही कर सकता है । ईश्वर का रूप ही कर सकता है । मैं बूढ़े बाबा के आगे नतमस्तक हो गया और प्रायश्चित की भावना से रोने लगा । मैं जिस परी के लालच में यह भूल गया था कि बूढ़ा मर जाए तो क्या मैं परी को पाल लूंगा । आज वही बूढ़े बाबा पुर आत्मविश्वास से निस्वार्थ प्रेम भावना को सर्वोपरि मानकर परी का जीवन मेरे हाथों में सौंप रहे थे । 

            सुबह होने को थी बूढ़े बाबा चांद से भी अधिक सुंदर परी का माथा चूमते हुए बोले उस पल परी बाबा की गोद में शांति से सो रही थी जिस पल बाबा ने यह शब्द बोले  । डॉक्टर साहब अब मेरे पास आज की सुबह को सलाम करने का समय नहीं है । कृपया करके मेरी दूसरी इच्छा भी पूरी जरूर कर देना । मेरी आंखें मेरी मृत्यु के बाद मेरे मित्र अब्दुल को लगा देना । ताकि वह बेसहारा इस दुनिया में कुछ खुशी कुछ गम के पलों को देख सके । मेरा अंतिम संस्कार मेरे मित्र को मेरी आंखें लगाने के बाद ही करना । मेरी आंखों से जब अब्दुल देखने लगे तो उसे मेरी तरफ से कहना मित्र मेरे मैं तेरे साथ उम्र भर तो नहीं चल सका । लेकिन तेरा पथ शिक्षक बनकर हमेशा तेरी आंखों में रहूंगा । इतना कहते-कहते बाबा ने परी को निहारते हुए अपनी आंखें बंद कर ली और परी को सीने से लगाए शांत होकर सो गए ।

 

बूढ़े बाबा अपने आखिरी सफर पर जा चुके थे । मृत्यु के सफर पर । जहां सबको जाना होता है एक दिन पापी हो या पुण्य आत्मा । किसी की जिंदगी का सूरज ढल चुका था किसी की जिंदगी में सवेरा करके । सुबह हो चुकी थी । मेरी आंखों से आंसू बह रहे थे । उस पल में यही सोच रहा था क्या करूं ? फिर ध्यान आया कि बाबा की इच्छा पूरी करनी है । मैं परी को रामू की देखभाल में छोड़कर बाबा के पवित्र शरीर को अपने साथ ही अस्पताल में ले गया । जहां मैंने उनकी आंखें निकालकर सुरक्षित रख दी और तुरंत अब्दुल को लेने शिरडी गांव पहुंच गया । मुझे अब्दुल को आंखें लगाने के साथ-साथ परी की चिंता भी हो रही थी । मैंने अब्दुल को अपने साथ अस्पताल लाकर उसे बाबा की आंखें लगा दी और उसके दोस्त मलुवा की मौत की खबर देकर मलुवा की आखिरी इच्छा के शब्द अब्दुल को बयां कर दिए । अब्दुल अपने दोस्त की कुर्बानी पर फूट-फूट कर रोने लगा । उसकी आंखों से दर्द के आंसू अपने दोस्त से बिछड़ने के आंसू बह रहे थे ।अब्दुल अपने खुदा से कहने लगा ! हे खुदा क्या मैंने तुझसे अपने दोस्त की आंखें मांगी थी ? मैंने तेरे से अपना दोस्त सही सलामत मांगा था । मैं अब्दुल के दर्द का अनुभव कर सकता था । उसके भावनाओं में उमड़े सैलाब को महसूस कर सकता था । मैंने रोते हुए अब्दुल को दिलासा दिया कि अब्दुल तुम्हारा दोस्त मलुवा मरा नहीं है । वह तुम्हारी आंखों में और परी के रूप में हमेशा हमारे साथ रहेगा ।  चलो अब चुप हो जाओ और साहस से अपने दोस्त मलुवा का अंतिम संस्कार करने के लिए उसे विदाई दो ।
        मैंने मलुवा के पवित्र शरीर के साथ अब्दुल से विदा ली एवं में मलवा के पवित्र शरीर को साथ लेकर घर की ओर चल पड़ा । मैं खुश था मेरे हाथों किसी की आंखें दुनिया देख रही थी । मैं एक अलग ही आनंद में खोया हुआ था परी के जीवन के आनंद में । मैंने बाबा का अंतिम संस्कार कर दिया था लेकिन परी के छोटे-छोटे कोमल हाथों के द्वारा । मैंने बाबा को परी के सच्चे पिता होने का सम्मान देकर अपने लालच का प्रायश्चित कर लिया था । एक नीम का पेड़ वहां जहां बाबा के पवित्र शरीर का अंतिम संस्कार किया था परी के हाथों लगवा दिया और नाम दिया सच्चा सांई । बूढ़े बाबा का सपना पूरा हो गया था । अब्दुल उनकी आंखों से दुनिया देख रहा था और परी तो परी है ही परियों की रानी उसे किस बात की चिंता । उसके साथ उसका स्वयं का साहस और बाबा का आशीर्वाद मेरा स्नेह भरा प्यार जो है ।


          लेकिन समाज से चंद सवाल ! क्या हर बच्ची परी की तरह खुश नसीब होती है ? क्या बूढ़े बाबा जैसा प्रेम ,साहस ,दोस्ती ,भक्ति और दान का सागर हमारे पास है ?क्या किसी और परी को ऐसी सर्द रात में कोई बूढ़े बाबा मिलेंगे या फिर न जाने कितनी ही परिय ऐसी सर्द रात में तड़प कर मर जाएगी ? 


तारीख: 20.08.2019                                                        देवेन्द्र सिंह उर्फ देव






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