वो गया है अमीरी लाने

इकाई- १ 

गायत्री बहुत उदास थी, उसका सात साल का बेटा भोलू पिछले कर्इ दिनों से बल्ला खरीदने के लिए, उसे परेशान कर रहा था। मगर आज तो हद ही हो गयी! सुबह-सुबह गायत्री के बचत गोलक में से भोलू रूपये चुराने की कोशिश कर रहा था। ये तो गनीमत थी कि गायत्री ने उसे देख लिया वरना भोलू गुल्लक चुरा ले जाता। हालांकि गुल्लक मे इतने पैसे नही थे कि भोलू को बल्ला मिल जाता। परन्तु बच्चों मे लालसा बहुत ज्यादा पायी जाती है, बच्चे जिन चीज़ो को एक बार सोच लेते है की लेना है तो उसे किसी भी कीमत पर लेना चाहते है। गायत्री बार-बार सोच रही थी कि इन्हीं हाथों से मैने कितनी बेरहमी से पीटा है अपनी नन्हीं-सी जान को। वो सोच ही रही थी की सामने से गोपाल आता दिखार्इ दिया, गायत्री ने निश्चय किया कि आज इनसे बहुत झगड़ूंगी, अब भोलू का कहीं नाम-वाम लिखवाऐं, भोलू सात साल का हो गया, बड़े-बड़े घरों में तो लोग अपने बच्चों को दूसरे साल से ही स्कूल में भेज देते है। गोपाल ने पास आकर पूछा-यहां क्यूं बैठी हो ? 

गायत्री- तब कहां जाउं, तुम्हें तो कुछ सोचना नहीं है। 

गोपाल- बात क्या है, तुम्हारा मुंह क्यों फूला है ? 

गायत्री- और नहीं तो क्या! रसोर्इ का छप्पर बारिश में चूने लगता है, खाना बनाना दूभर हो जाता है, बिस्तर वाले छप्पर की टाट टूटी हुयी है, और तो और भोलू का नाम भी नहीं लिखवाए कहीं । कब तक ऐसे ही सोते रहोगे ? 

गोपाल- अरे प्रधान जी से इंदिरा आवास के लिए कहा था लेकिन...........अच्छा तूम एक लोटा पानी लाओ पहले। 

गायत्री उठकर पीछे एक जीर्ण-शीर्ण छप्पर के अन्दर पानी लाने चली गयी, गोपाल वहीं बैठकर अपनी ग़रीबी के बारे में सोचने लगा। अभाव इन्सान को कुछ पल के लिए पंगु बना देता है, मगर अभाव में इतनी ताकत होती है कि यदि इन्सान ठान ले तो पहाड़ खोदकर दरिया बहा सकता है। गोपाल के चेहरे पर भी आज एक नयी तरह की उलझन झलक रही थी। गायत्री सिल्वर के एक पचके और टेढ़े-मेढ़े लोटे में पानी तथा कागज में एक गुड़ का छोटा-सा टुकड़ा लेकर आयी। गोपाल ने लोटा अपने हाथ में लिया तथा अपने मुंह से तम्बाकू के फेरे को निकालकर एक कोने में थूका, पानी से कुल्ला करते हुए बोला आज प्रधान जी के यहां गये थे इंदिरा आवास के सिलसिले में, सोचा था हमने, एक कोठरी सरकारी दिलवा देंगें तो उसके सामने एक छप्पर सही करवा के लटका देंगे हम, तो समस्या कुछ हद तक दूर हो जायेगी। परन्तु उन्होंने कहा कि एक ही इंदिरा आवास हमारे गांव के लिए आया था वो भी राजू भइया ने ले लिया। 

गायत्री- राजू भइया ने...........? उन्हें इंदिरा आवास की क्या जरूरत उनके पास तो तमाम धन है। 

गोपाल ने गायत्री से गुड़ लेकर मुंह में रखा और दांतो से फोड़ते हुए बोला- अरे भार्इ खै़रात किसी को बुरी तो लगती नही है, सुना है इंदिरा आवास में मिलने वाले धन से एक कमरा बनवायेंगें जिसमें अपनी चौ पहिया खड़ी करेंगे। गायत्री ने मुंह बनाते हुए कहा- वाह क़ुदरत का करिश्मा, किसी के पास रहने को घर नहीं कोर्इ अपने मोटर-गाड़ी के लिए घर बना रहा है। वक्त से बड़ा न कोर्इ पत्थर दिल है और न ही कोर्इ रहमदिल। वक़्त ख़राब तो दुनिया बेकार, वक़्त अच्छा तो हर शय अच्छा। गोपाल ने लोटा गायत्री के हाथ में थमाते हुए बोला, भोलू कहां है ? कहीं घूम रहा होगा, पर तुम अब दिल्ली चले जाओ, कुछ कमाओ प्रधान-वरधान से कल्याण होने वाला नहीं है। गायत्री नसीहत देते हुए अन्दर की ओर चली गयी।

इकाई-२

गोपाल दिल्ली जा रहा था, उसकी आंखें भरी थी, मन भी बोझिल हो रहा था, जाने की बात आते ही न जाने क्यूं ह्रदय कांप उठता था, मगर ग़रीबी उसे दिल्ली की ओर धकेल कर ले जा रही थी। गायत्री ने चूल्हे की मोटी-मोटी चार रोटी और आलू की भुजिया बना कर एक झिल्ली में बांध दिया था। कल्लन काका द्वार पर आये, गोपाल ने पैर छूते हुए कहा जा रहा हूं काका, इन लोगों का ध्यान देना। काका ने आर्शीवाद देकर पूछा कितने बजे है गाड़ी ? काका सवा सात बजे है गोरखधाम गोण्डा जं0 से पकडेंगे। जल्दी जाना पड़ेगा जनरल टिकट के लिए लाइन बहुत लम्बी लगती है। चार बजे गोपाल अपने घर से निकल लिया गोण्डा जं0 स्टेशन के लिए। जाते वक्त गोपाल और गायत्री की आंखे छलछला कर बह उठीं, भोलू दौड़़कर आया पापा-पापा मेरे लिए टी शर्ट लाना।

इकाई ३

गोपाल को दिल्ली पहुंचें तीन महींने हो गये थे, वो अपने गांव के कुछ लोगों के साथ घर बनाने में मजदूरी करने लगा था। खा-पीके दो हज़ार रूपये हर महीने बचा लेता था। एक दिन गोपाल एक घर तोड़ने का काम कर रहा था, वो घर पुराना हो चुका था, सो घर मालिक नये नक्शे से घर बनवाना चाह रहा था उस पुराने घर को तोड़ने का ठेका गोपाल के मिस्त्री को ही मिला था। गोपाल और उसके साथ तीन लोग मिलकर छत तोड़ रहे थे। बगल में चाइनीज मोबाइल पर कुमार शानू का एक मशहूर गीत जीता था जिसके लिए चल रहा था। गर्मी के दिन थे, सूरज मांथे पर चढ़ा जा रहा था। तीनों आपस में बात कर रहे थे। गोपाल पसीने से पूरी तरह भीग चुका था, पसीने-पसीने तो बाकी दोनो साथी भी थे पर उतना नहीं जितना की गोपाल। एक साथी ने कहा अगर इस बार मोदी प्रधानमंत्री बनें तो देश का विकास होगा। दूसरे साथी ने कहा राहुल भी ठीक हैं। गोपाल ने झुंझलाकर उत्तर दिया अरे कोर्इ बने लूटेगें हमें ही। किसी तरह दस हज़ार इकटठा कर लें हम भइया तो जाके घर का छप्पर सही करवा दें और भोलू का नाम कहीं लिखवा दें। प्राइमरी में कुछ पढता ही नही है। तीनों साथी अपनी-अपनी सुना रहे थे। बात करते-करते वक़्त जल्दी गुज़र जाता है। तीनों मित्र हथौड़े से छत पर एक के उपर एक प्रहार कर रहे थे, कुछ ही पलों में छत मे छेद हो गयी। इन छरहरे बदन वाले नौजवानों को देखकर हैरान होना लजि़मी है, इनके बाजुओं में इतनी ताक़त आती कहां से है। ये तो कोर्इ ताक़ती गोली या फिर केला-दूध भी नहीं खाते। शायद इनके हौसलों और परिसिथतियों ने इन्हें यह ताक़त दी है। इतने पहाड़तोड़ू बाजुओं वाले इन नौजवानों को कोर्इ पैसे वाला दुबला पतला शख़्स भी दबा देता है, ये बातें अपने आप में कितना विरोधाभास पैदा करती हैं । काम करते-करते शाम हो गयी, छुटटी मिली। सब साथियों ने ठेले पर कुल्चे खाकर पेट भरे और बीड़ी पीते हुए सोने चल दिये अपने बिस्तर फुट ओवर बि्रज पर। रात में पूरे बि्रज पर इन मज़दूरों की एक पलटन पड़ी रहती थी। उस रात भी गोपाल और उसके साथी ओवर ब्रीज पर पहुंचे, अंगोछा बिछाया और जिसको जितनी थोड़ी बहुत जगह मिली चिपक रहा, मस्त पुरवायी हवा बह रही थी। नींद ऐसी आयी जैसे फूलों की सेज मिल गयी हो ।

इकाई-४

गोपाल के जीर्ण-शीर्ण घर के सामने भीड़ लगी थी, छप्पर के अन्दर से तेज़-तेज़ रूदन की आवाज़ें आ रहीं थी, पूरा टोला शोक में डूबा हुआ था। ग्राम प्रधान और राजू भइया एक साथ पहुंचे, कल्लन काका से कहा बड़ा अनर्थ हो गया भार्इ। सात साल का लड़का और बेचारी गायत्री अभी क्या उमर है उसकी। कल्लन काका ने अपनी सजल आंखो को पोंछते हुए कहा प्रधान जी होनी का जो मंजूर रहा उ होइ गवा, गायत्री तो बर्बाद होय गयी बेचारी। गांव की बुजुर्ग महिलाओं ने एक बाल्टी पानी गायत्री की मांग पर फेंका, उसका सिंदूर बह चला, गायत्री रोते-रोते बेहोश हो गयी, महिलाओं ने उसके हाथ को पत्थर पर पटक-पटक कर सारी चूडि़यां तोंड़ डाली। पूरा माहौल रूदन से भर गया, टोले का कण-कण रो रहा था। भोलू मामले को समझने की कोशिस कर रहा था। गांव के दो-तीन बच्चे नाक पोंछते हुए भोलू के उदास चेहरे को देख रहे थे। महिलाओं ने गायत्री के चेहरे पर पानी डाला, गायत्री फिर से होश में आयी। ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर भगवान को कोसने लगी। एक गाड़ी द्वार पर आकर रूकी, गाड़ी में से गोपाल की लाश निकाली गयी, देखते ही देखते पूरा टोला, स्त्री, बच्चें, बूढ़े, जवान सब के सब रो पड़े। कल्लन काका को जाते वक़्त का चेहरा याद आ गया और काका कराह उठे- वाह रे भगवान अस अंधेर काहेक........... अब कहां जइहैं यै बेचारे ? 

गोपाल बीती-रात छत तोड़कर बहुत थक चुका था और जाकर रोज़ की तरह ओवरब्रिज पर एक किनारे सो गया था, थकान अधिक होने के कारण नींद बहुत गहरी आ गयी थी, सोते-सोते न जाने कब ओवरब्रिज से नीचे गिर गया, नीचे बडे़ पत्थर पर गिरने से गोपाल का कपार फूट गया और गोपाल अपनी ग़रीबी से सदा के लिए मुक्त हो गया, उसने इस मृत्युलोक को अलविदा कह दिया, गायत्री पत्थर हो चुकी थी। किसी ने भोलू से कहा- तेरा बाप गया है, अमीरी लाने। तभी एक बार फिर पूरा गांव रों पड़ा।
 


तारीख: 10.06.2014                                                        मनीष ओझा






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