बहादुर

    रेलवे स्टेशन की फुटपात पर बैठकर भीख मांगते हुए बहादुर को एक अरसा हो गया। जब पहली बार यहाँ आया फिर कभी अपने घर नहीं लौटा। इसका कारण दोनों पाँवों से विकलांग तो था ही साथ ही अब बचा ही कौन है? जिसके लिए वह बाहर जाये। अपने कदम दूसरों की सलामती के लिए चलाने से जो आनंद मिलता है वह अपने लिए नहीं। 


    स्टेशन पर आते-जाते लोगों को देख समझ जाता कि बाहर की दुनिया काफी बदल चुकी हैं। कभी सोचता शायद लोग तो वही हैं, बस उनका रहन-सहन, चाल-ढाल बदल गया। पहले लड़के नीचे से पेंट चैड़ी पहनते थे और ऊपर से एक दम टाईट पर अब उल्टा हो गया। उस ज़माने में फटे कपड़े का मतलब गरीबी से ही लगाया जाता था पर अब नहीं। दुनिया कब तांगागाड़ी से ओला और उबेर पर आ गयी पता ही नहीं चला? अब लोगों के पास समय होते हुए पता नहीं कैसे जनसंख्या बढ़ गयी। पहले समय बहुत होता था पर जनसंख्या कम। किमतों ने भी दल बदल लिया, पहले लोग किमती थे अब समय। बहादुर के देखते-देखते सब उल्टा-पुल्टा होता गया। जाने कैसी आधुनिकता की आँधी आयी की कपड़ों के साथ-साथ इंसान के दिल भी सिकुड़ते गये जबकि पेट का आकार बढ़ता गया। बहादुर खामोशी से दुनिया को बदलते देखता। कुछ लौकिक तो कुछ अलौकिक विचारों में हमेशा डुबा रहता। 


    कईं दिनों से उसने किसी से बात नहीं की। आज भी करने का मन नहीं, अब खामोशी में ही इस अद्भुत दुनिया को देखना अच्छा लगता। ऐसा नहीं है कि उसे अब भीख की जरूरत नहीं या कोई स्टाॅक उसकी तिजोरी में पड़ा हुआ है जिसके बल पर इतराये। बल्कि अनुभव ने सीखा दिया कि चिल्ला-चिल्ला कर भीख मांगने पर भी पैसा वही देता जो देना चाहता, पैसे देने वालेे ऐसी किसी औपचारिकता का इंतजार नहीं करते। यही तो जीवन का तजुर्बा है जो उसने अपने स्टाॅक में जमा किया। आज के नये-नये भिखारियों को फुटपात पर बेतहाशा चिल्लाते देखता हैं, ‘बाबूजी ! ईश्वर के नाम पर दे दो..., बाबूजी ! अल्लाह के नाम पर दे दो...’ तो उन पर मन ही मन हंसता पर कहता किसी से कुछ नहीं। सब अपने तजुर्बे से सीखते है। कभी कोई भिखारी अधिक उत्साह में लोगों के कपड़े तक खिंचने लग जाता तो बहादुर को अपनी बिरादरी पर दया आती। बोलने से उसे अब चिढ़-सी हो गयी। किसी मौन साधक की तरह बैठे-बैठे आते-जाते मुसाफिरों को देखता। अगर कोई उसे कुछ पैसा देता तो आंखों से ही उसका शुक्रिया अदा कर देता।


    ‘‘कसान हो काकु?’’ बहादुर के पीछे से किसी जवान महिला की आवाज़ आयी। मुड़कर देखे बिना ही पहचान लिया कि ये तो ‘जमुरिया’ है। जमुरिया पेशे से नयी-नयी भिखारिन थी। एक दम फ्रेशर। हालांकि दिखने में ठीक-ठाक थी और उम्र भी तीस के एक दो ऊपर-नीचें होगी। किन्तु बहादुर ने कभी पुछा भी नहीं और उसने बताया भी नहीं कि यह पाठ्यक्रम क्यों चुना। जब पहली बार इस स्टेशन पर आयी तो बहादुर ने ही उसे भीख मांगने के सारे दाँव-पेंच सिंखाये। किन्तु अब उसे लगने लगा कि जमुरिया का पास बैठना उसकी आमदनी कम कर रहा है। लोग अब उसे कम और जमुरिया को ज्यादा पैसे देने लगे। ऐसा नहीं है कि उसे जमुरिया से जलन होती, बल्कि वह तो खुश था। जब नयी आयी थी तो पेट भरने के लिए मोहताज हो गयी थी पर अब बड़े शौक से सिर्फ पेट ही नहीं भरती कभी कभार पिज्जा-बर्गर की दावत भी उड़ा लेती। उसे इस बात से भी कोई दिक्कत नहीं थी कि वह पिज्जा खाये या बर्गर चगले। 


    जब से वह बहादुर के पास आकर बैठने लगी, लोग जवान औरत को लाचार समझ बहादुर के हिस्से के पैसे भी उसे ही दे देते। र्कइं बार बहादुर के बँधे-बँधाये ग्राहक भी जमुरिया की तरफ झुकने लगे। वह समझ नहीं पाता था कि इस झुकाव के पिछे कौनसा गुरूत्वाकर्षण का सिद्धान्त काम कर रहा था? पर कोई ना कोई सिद्धान्त जरूर होगा। एक बार तो हद ही हो गयी जब एक मनचले ने एक रूपया जमुरिया को देते हुए कहा ‘‘कुछ लेकर खा लेना’’ फिर उसने बहादुर की तरफ देखते हुए कहा, ‘’सिर्फ बापू को ही खिलाने में मत रह। अपना खयाल भी रखा कर। कितनी दुबली हो गयी। जबकि इसे देखो, खा-खा कर साँड हो गया है साँड।’’ उस दिन बहादुर को लगा कि दुनिया दुबले लोगों के प्रति कितनी दयालु है। 


    ‘‘ठीक हूँ बेटा’’ नहीं चाहते हुए भी जमुरिया से बात करनी पड़ी। 
    ‘‘आज काल तो घणा रूपिया छापिरा हो’’ हँसते हुए जमुरिया उसके पास बैठ गयी।
    ‘‘हाँ.. विदेश जाने के लिये रूपये इकठ्ठे कर रहा हूँ। सोच रहा हूँ कोई गोरी भिखारिन मैम से शादी कर के वहीं घर बसा लू?’’ बहादुर ने देखा जमुरिया के दाँत अधिक गुटका खाने के कारण काले पड़ चुके थे। 
    ‘‘काई बापू थाई काई मजाक करो।’’ 
    ‘‘शुरू तुने की थी बेटा, वरना इस उम्र में, मैं खुद मजाक बन गया हूँ।’’ बहादुर ने गंभीर मुद्रा में कहा।


    जमुरिया जानती थी की अस्सी वर्ष का बुढ्ढ़ा क्या शादी करेगा। अतः उसने वार्तालाप को यहीं विश्राम देना उचित समझा। चुपचाप दोनों बैठ गये। जमुरिया आते-जाते लोगों को देखने लगी। बहादुर सामने टीन की छत पर बैठे कबूतर के जोड़े को देख रहा था। दोनों कपोत एक दूसरे से मानों जनम-जनम का साथ निभाने की कस्में-वादे कर रहे हो। उसे अपना अतित याद आने लगा। शनैः शनैः आँखों के सामने छाने लगा।  


    
    जब पहली बार उसकी शादी गंगा से हुई थी तब उसने गंगा का हाथ अपने हाथ में लेकर कितने कस्में-वादे किये थे। आखिर इस दुनिया में गंगा के सिवा उसका था कौन? भरी जवानीं मेें उसके माँ-बापू चल बसे। बचपन गाँव के चैराहे पर बनी चाय की दुकान पर झुठे कप धोकर बिता। रिश्तेदारों ने उसके हिस्से की जमीन बेच कर जैसे-तैसे शादी करवा दी। रिश्तेदारी के ऋण से मुक्त हुए। गंगा के आते ही बहादुर में नई जान आ गयी। इस बैगानी दुनिया में कोई अपना हो, जो जीवन जिने का कारण बन जाये, तब जीवन बहुत सुन्दर लगने लगता है। 
    ‘‘कब तक यहाँ लोगों के झुठे गिलास धोते रहोगे? बारदेश जाकर कुछ पैसे-पाई कमाने का टेम है। सुना है पड़ौस में रहने वाले गिरधारी काका का लड़का गणेश शादी करते ही अपनी जोरू के साथ बारदेश कमाने गया। पता है, आज उसने कितना पैसा-पाई इकठ्ठा कर लिया?’’ बहादुर की पत्नी ने शाम को चिमनी की रोशनी में खाना परोसते हुए कहा।


    ‘‘कितना’’ कोर मुँह में रखने से पहले बहादुर ने ध्यान दिये बिना कहा।


    ‘‘लाखों रूपये है उसके पास... लाखों...’’ गंगा ने लाखों बोलते समय अपनी आँखें बड़ी-बड़ी करते हुए कहना जारी रखा, ’’ऊपर से शहर में अपना खुद का बंगला भी बना लिया है गिरधारी काका के गणेश ने...’’ औरत ने एक ही सांस में सारी बात उगल दी। प्रतिक्रिया के इंतजार में बहादुर का चेहरा देखने लगी।


    बहादुर ने खाने का कोर पूरी तरह से चबाने के बाद पानी का घूंट गले उतारते हुए कहा ‘‘यहाँ गाँव में ही कोई खेती-मजूरी कर लेंगे। वहाँ शहर में हर आदमी लखपति नहीं बन जाता।’’
    उस दिन बहादुर ने गंगा को लाख टके की बात बहुत बार समझाने की कोशिश की पर वह टस से मस नहीं हुई। दूसरे ही दिन जैसे-तैसे गणेश का पता ठिकाना लिया गया। तय कार्यक्रम के अनुसार सस्ते में गाँव का घर बेच दिया गया। बहादुर उस आखिरी निशानी को बेचना नहीं चाहता था किन्तु गंगा की जिद व किराये-भाड़े की रकम के अभाव के कारण यह कदम उठाना पड़ा। 


    दोनों शहर की कस्ती में सवार हो गये। गाँव में जमीन-जायदाद बची भी नहीं थी जिसकी परवाह उन्हें होती। शहर पहुँचे तो देखा चारों तरफ चकाचैंध रोशनी। दोनों पहली बार शहर आये इसलिए गाँव व शहर के फर्क को इंच दर इंच नापते हुए चलने लगे। गणेश की हवेली शहर के खदान वाले इलाके में थी लिहाजा दोनों पैदल ही उस ओर चल दिये। रात काफी गहरा गयी थी किन्तु यहाँ तो चारों तरफ चहल-पहल है। 


    ‘‘देखो जी ! यहाँ तो सड़कों पर कितनी रोशनी है, गाँव में घरों को नसीब नहीं’’  गंगा ने स्ट्रीट लाईट की तरफ इशारा करते हुए कहा।
    ‘‘यहाँ गणेश जैसे लखपति भी तो रहते है।’’ बहादुर अभी भी गंगा से नाराज था।


    दोनों चलने पर ध्यान देने लगे। कुछ ही देर में खदान वाले इलाके की कच्ची बस्ती में पहुँच गये। वहाँ जाकर बड़ी मशक्कत के बाद गणेश का घर मिला। गणेश का घर देख दोनों के होश उड़ गये। घर क्या एक कच्र्ची इंटों की झौंपड़ी बनी हुई थी। ऊपर टीन की छत। उस दिन बहादुर पहली बार अपनी पत्नी पर बहुत चिल्लाया। किन्तु जब शहर आ ही गये तो अब वापिस गाँव जाना उचित नहीं समझा। अब वहाँ उनका बचा ही क्या था?


    गणेश एक खदान में पत्थर तोड़ने का काम करता था लिहाजा उसने बहादुर को भी वहाँ लगा दिया। खदान के मैनेजर ने गणेश के पास ही एक झौंपड़ी बहादुर को भी अलाॅट करवा दी। दिनभर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद वह कब घर आता, कब खा-पी कर सो जाता पता ही नहीं चलता। देखते ही देखते बहादुर को शहर आये एक साल बीत गया। उधर गाँव में भी कोई नहीं बचा जोे उसकी खोज-खबर लेने आये। वार-त्योहार गणेश जरूर आया-जाता करता था। वह जब भी गाँव जाता तो नये कपड़े पहनकर जाता। साथ में अपनी पत्नी को भी नये कपड़े दिलवा देता। जितना वह कमाता सब दिखावे में उड़ा के आ जाता। बहादुर को इससेे कोई आपत्ति नहीं थी, पर उसे अब पता चला की लोग सिर्फ दिखावे के लिए ही अपना सब-कुछ दाँव पर लगा देते हैं।


    एक दिन खनन में काम करने के कारण गणेश किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो गया। जोड़-तोड़ करके उसके पास से एक फूटी कौड़ी नहीं बची थी जिससे इलाज करवा सके। बहादुर ने अपनी जमा पूँजी से उसका इलाज करवाया पर वह बच नहीं सका। उसके मरते ही उसकी पत्नी वापिस गाँव चली गयी। अब बहादुर एवं उसकी पत्नी दोनों अकेले रह गये।


    बहादुर नहीं चाहता था कि उसका हश्र भी गणेश जैसा हो लिहाजा देर तक काम कर के अधिक रकम जमा करने लगा। सोचा कुछ पूँजी इकठ्ठी हो गयी तो वापिस गाँव जाकर पुश्तेनी घर व खेत फिर से खरीद लेगा, नये जीवन की शुरूवात करेगा। अब उसे शहर की चकाचैंध से घबराहट होने लगी। उसकी पत्नी भी सहमत हो गयी। 


    एक दिन खनन पर पत्थर तोड़ते समय अचानक एक भारी पत्थर उसके पाँव पर गिरा। बहादुर का पाँव उसकी आँखों के सामने टूटकर दूर जा गिरा। बहादुर वहीं पर बेहोश हो गया। जब होश आया तो किसी सरकारी अस्पताल के पलंग पर स्वयं को पाया। सामने उसकी पत्नी रो रही। अगल-बगल में और भी कईं सारे सरकारी पलंग लगे थे जिन पर बिछी मैली-कुचैली चादरों पर मरीज़ एवं मरीज़ों पर मुहब्बत लुटाते मच्छरों का बराबर शोर सुनाईं दे रहा था। 


    खान मालिक ने बहादुर का इलाज़ अपने खर्चे से करवा दिया। इलाज कराने का खर्चा आया उससे तीन गुना करके बताया गया। बहादुर भी मन मसोस कर रह गया कि होनी को कौन टाल सकता। खान मालिक ने उसे नौकरी से नहीं निकाला एवं पत्थर उठाने की मशीन चलाने का काम दे दिया। डुबते को तिनके का सहारा चाहिए। बहादुर सहमत हो गया पर मंैनेजर ने उसकी पगार आधी कर दी। मरता करता भी क्या? लिहाजा बहादुर इस बात पर भी सहमत हो गया। 


    कुछ समय अच्छे से गुजरा की एक दिन मशीन से उतरते समय बहादुर खान में गिर पड़ा। दूसरा पाँव भी टूट गया। फिर से वही सरकारी अस्पताल। फिर से वही इलाज। इस बार दोनों हाथों के नीचें लकड़ी के दो डंडे पकड़ा दिये गये। पहले तो वह अकेला चल भी लेता था पर अब उसे चलने के लिए किसी के सहारे की जरूरत पड़ती। 


    फिर एक दिन मैंनेजर ने उसे अपने आॅफिस में बुलाकर पास बिठाया। एक लड़के को भेजा ‘‘काका को चाय पिला’’। वह इस अप्रत्याशीत अनुकंपा को समझ नहीं पा रहा था। मैंनेजर ने रजनीगंधा खाकर पास मेें रखी बाल्टी में पीक थूँकते हुए समझाया कि वह अब उनके लिए किसी काम का नहीं रहा। वे लोग चाहते तो हंै कि उसे नौकरी पर रखें पर नोटबंदी और आर्थिक मंदी का दौर चल रहा हैं। ऐसे में उसे देने के लिए वेतन उनके पास नहीं है। किन्तु उसकी दयनीय स्थिति को देखते हुए उसको घर से बेदखल नहीं किया गया। किन्तु बहादुर को समझ नहीं आया कि दोनों पाँव खोने के बाद ही नोटबंदी व आर्थिक मंदी क्यों आयी?


    अब बहादुर घर पर ही रहने लगा। गंगा खुद से ज्यादा बहादुर का ध्यान रखती। ऐसा कोई दिन नहीं जब वह शहर आने के निर्णय पर पछताती नहीं या फफक-फफक कर रोयी नहीं। उसकी ही मति मारी गयी जो शहर आने की जिद पकड़ी। बहादुर के पास समझाने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं बचा था। वह गंगा को समझाता की नियति को कौन टाल सकता है?


    समय अपनी गति से चलता रहा। बहादुर की पत्नी लोगों के घरों में चैका-बरतन कर दोनों का पेट पालने लगी। 


    बहादुर ने एक दिन कहा, ‘‘दिन भर अकेला बैठा रहता हूँ, अगर चैराहे के मंदिर छोड़ जाया करो । वहाँ घड़ी दो घड़ी भगवान का ध्यान कर लुंगा। पुराने जनम के पाप ही थे जो आज ये दिन देखना पड़ रहा।’’ कुछ देर ख़ामोश रहने के बाद बोला, ‘‘इस जनम में थोड़ा धरम कर लेंगे तो अगला अच्छा हो जायेगा’’ 
    पत्नी इस बात पर सहमत हो गयी की चलो वहाँ इनका समय आसानी से निकल जायेगा। वैसे भी घर अकेले बैठे-बैठे परेशान हो जाते। वह बहादुर को रोज मंदिर छोड़ अपने काम पर चली जाती। शाम को आते समय मंदिर होकर आ जाती। किन्तु बहादुर के मन में कोई और ही बात चल रही थी। 
    जैसे ही पत्नी मंदिर छोड़कर जाती, बहादुर मंदिर की सिढियों के बाहर आकर अपनी जेब से कपड़ा निकाल उसे बिछा कर बैठ जाता। पहले-पहल बड़ी ग्लानि हुई पर धीरे-धीरे आदि हो गया। अपाहिज देख लोग-बाग एकाध रूपया दे जाते। शाम को पत्नी के आने का समय होता उससे कुछ समय पहले फिर से मंदिर में जाकर बैठ जाता। आँखें बंद कर किर्तन में लग जाता। गंगा को इस बात का अहसास नहीं होने दिया की वह मंदिर भीख मांगने जाता है।


    एक दिन बहादुर ने साफ सुधरे सफेद कपड़े पहने एक सज्जन के सामने भीक्षा के लिए हाथ फैलाया, उसने कुछ देर के लिए घूरा। फिर पास आकर बोला, ’’अच्छे-खासे कपड़े पहने हो, मुझे तो तुम किसी एंगल से भिखारी नहीं लगते। यहाँ मंदिर के बाहर तुम्हारा ये बिजनस नहीं चलेगा।’’ उस दिन बहादुर को अहसास हुआ कि इंसान वही देखता व यकीन करता है जो उसे दिखाया जाता। उसे देखने-समझने का प्रयास नहीं करता जो वाकई में दिखाई दे रहा।

 
    बहरहाल बहादुर एक-एक रूपया जोड़ कर अपनी पत्नी के लिए सरप्राईज के तोर पर गहना खरीद कर देना चाहता था। जब से शादी हुई है उसने कभी इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया। न ही गंगा ने ऐसी कोई मांग रखी। उसे पत्नी पर दया आने लगी। वह बेचारी दिन भर मजूरी कर के आती और घर का सारा काम करती। ऊपर से उसकी दवादारू का भी ध्यान रखती। 


    कभी-कभी बहादुर को अपनी किस्मत पर रोना आता था। चाहते हुए भी किसी को अपना दर्द बता नहीं सकता। किसे बताये? इंसान की तकलीफें आजकल इंसान की समझ से बाहर होती जा रही। आजकल तो चमक-दमक की दुनिया है। उसे लगा अब जल्दी ही इस दुनिया से विदा ले लेना चाहिए पर ये ईश्वर का कहाँ मंजूर था।


    एक सुनार रोज मंदिर आता था। बहादुर स्वयं तो उसकी दुकान पर जा नहीं सकता लिहाजा उसने सुनार से बात कर के पत्नी के लिए सुन्दर गहना बनवा लिया। अपना सारा जमा धन उसने सुनार को दे दिया। सुनार ने तय समय पर उसे वह गहना लाकर थमा दिया और साथ में यह हिदायत भी दी कि ‘‘मुझ पर तो विश्वास किया पर आगे से इस प्रकार किसी पर विश्वास कर पैसे मत दे देना। तुम ठहरे दोनों पाँवों से अपंग। कोई लेकर रफूचक्कर हो गया तो कहाँ ढूँढते फिरोगे।’’ 


    उस दिन बहादुर ने सुनार को बहुत धन्यवाद दिया। वह बहुत प्रसन्न था कि आज पहली बार अपनी पत्नी को कोई गहना देने वाला है। सोचा रात को खाना परोसते समय उसके सामने ले जाकर रख दुंगा। वह देखेगी तो उछल पड़ेगी। उसकी आँखों से खुशी के आँसू बह चलेंगे। कुछ इसी प्रकार के खयालों में खोये हुए बहादुर को एक पुलिसवाले ने आवाज़ लगायी,


    ‘‘तुम्हारा नाम बहादुर है?’’ पुलिसवाले ने उसके पास आकर पूछा।
    ‘‘हाँ साब’’
    ‘‘तुम्हारी पत्नी का सड़क पार करते समय एक्सीडेण्ट हो गया और उसकी मृत्यु हो चुकी है।’’
    उस दिन ईश्वर के दरबार में बहादुर ने उस पत्थर की मुर्ति को खूब भला-बुरा कहा। रोता गया, मुर्ति को कौसता गया। पुलिसवाला उसे अपने साथ ले गया। कुछ औपचारिकताओं के साथ उसकी पत्नी का अंतिम संस्कार कर दिया। जब उसकी पत्नी की चिता जल रही थी तो उसे लगा मानों गणेश की आत्मा भी यहीं कहीं श्मशान में पत्थर तोड़ती दिखाई दे रही।
    श्मशान से बाहर आकर उसने जेब में हाथ डाला तो उसे एक दस का नोट एवं गहना मिला। उसने रिक्शा कर लिया व एक सुनार की दुकान पर पहुँच गया। रिक्शेवाले को पाँच रूपये दिये तो उसने नज़दीक की सुनार की दुकान पर पहुँचा दिया। उसने सोचा जब पत्नी ही नहीं रही तो भला गहना किस काम का। इसे बेचकर रूपये ही ले लेगा तो जरूरत के वक्त उसके काम आवेंगे। 
    ’’ये तो नकली है’’ सुनार ने गहना परखने के बाद बहादुर की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘हमें ही मूर्ख बनाने आया। निकलो यहाँ से।’’


    बहादुर इस बार नहीं रोया, उसके आँसुओं का सारा स्टाॅक समाप्त हो चुका था। उसे उस सुनार का कथन याद हो आया ‘‘.......आगे से इस प्रकार किसी पर विश्वास करके पैसे मत दे देना।’’ वहाँ से बाहर आकर बहादुर एक चबूतरे के नीचे पेड़ की छायाँ में बैठ गया। सुबह से शाम तक वह वहीं पर बैठा-बैठा सोचता रहा। आज पहली बार घण्टों बिना पलक झपकाये लोगों को आते-जाते देखता रहा। जब अँधेरा गहराने लगा तो उसने एक रिक्शा बुलाया और पूछा, ‘‘खनन इलाके की कच्ची बस्ती जाने के कितने रूपये लोगे?’’


    ‘‘पाँच रूपये?’’ रिक्शे वाले ने कहा।
    ‘‘और रेलवे स्टेशन जाने के?’’ बहादुर ने पूछा।
    ‘‘उसके भी पाँच रूपये’’ 
    बहादुर रिक्शे में जाकर बैठ गया। उसके पास केवल पाँच रूपये बचे है और ये दुनिया।
    ‘‘कहाँ जाना है?’’ रिक्शेवाले ने रिक्शा चालु करते हुए पूछा। 
    ‘‘रेलवे स्टेशन’’ बहादुर ने दृढ़ स्वर में कहा मानो आखिरी मंजिल मिल गयी हो।


तारीख: 20.10.2017                                                        प्रेम एस. गुर्जर






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