मैं,माया : एक पुरुष के शरीर में आहिस्ता दफन हो रही एक औरत

राहुल झा की कहानी सीरीज ' प्यार के इस रांदेवू (rendezvous) में ' के अंतर्गत तीसरी कहानी 

"...मैं क्या हूँ ?" यह सवाल हमें छोड़ कर तकरीबन हर उस इनसान के मन में अपनी उपस्थिति जाहिर कर चुका है जिसकी आँखों के सामने से हम कभी गुज़रे थे | वैसे तो हमारे सभी प्रमाण पत्रों पर 'पुरुष' लिखा हुआ था पर भीतर कहीं से भी अपने पुरुष होने का प्रमाण नहीं मिल रहा था | पापा के हज़ारों रूपये का सूट पहनने से कहीं ज़्यादा इच्छा मम्मी का वो पांच सौ वाली सलवार कमीज पहनने की थी | इसी भीतरी उन्माद से प्रेरित होकर एक रात सबके सो जाने के बाद चुपके से माँ की वो सफेद वाली सलवार कमीज अपने कमरे में लेकर आई और पहन कर आईने के सामने खड़ी होकर खुद को कुछ आधा घंटा निहार | सुन्दर लग रही थी मैं | उस दिन के बाद तो मन रूपी पुल एक स्त्री को सुन्दर लगने वाली हर चीज़ ( मर्द भी ) रूपी रेलगाड़ी को देख कर थरथराने लगा था | और इस नए एहसास के साथ दुनिया को देखने में दुष्यंत कुमार जी की कविताएँ एक साथी के जैसे हाथों में हाथ डाले चल रही थी |

कुछ रोज़ बाद राजीव चौक मेट्रो पर होली से ठीक एक दिन पहले एक लड़के से टकरा गयी और उस वक्त पता चला के जगजीत सिंह ने जब कहा था कि "इश्क़ कीजे फिर समझिए,बेखुदी क्या चीज़ है | " तो कितना सटीक कहा था | शामों के मानसून के गुज़र जाने के बाद एक और बार जब लक्ष्मण आँखों के सामने से निकला, वहीँ राजीव चौक मेट्रो पर तो खुद को एक घंटा बाद उसी के साथ हनुमान मंदिर के सामने 'कॉफ़ी हाउस' में पाया | कुछ बात कर रहे थे हम कि कैसे वो एल.जी.बी.टी.क्यू. समुदाय के लोगों के प्रति एक उदार भाव रखता है | और कुछ मुलाकातों के बाद हमने उसे अपने दिल की इच्छा ज़ाहिर की | सरप्राइज सरप्राइज उसने बिना किसी ना नुकुर किये हामी भर दी | अब हम भी एक कपल की तरह साथ में बहुत वक्त भी बिताते और वो सभी चीज़ें भी करते जो एक आम कपल करता है | ज़्यादा सोच में मत पढ़िए, हम सेक्स भी करते थे | पर जबी पिताजी को इस बात का पता चला तो पहले वे अपने हाथ की नस काटने दौड़े फिर हमारे | खैर माँ ने ऐसा कुछ भी होने से पहले अपने उस ब्रह्मास्त्र का सहारा लिया जिसे हम आप रोना कहते हैं | उनके रोने भर की देर थी कि घर में शांति का एक इक्विलिब्रियम जेनरेट हो गया | सब वापस ख़ामोशी की चादर के नीचे छुपा दिया गया | पर हम अभी भी स्तब्ध थे | दिन बीत गया और अगली सुबह मनोवैज्ञानिक के पास चिकित्सा के लिए ले जाया गया हमको |

लेकिन अब इसकी वकालत कौन करे कि ये प्यार है रोग नहीं | क्यों नहीं इस बात को तरजीह दी जाती है कि ये सिर्फ एक चुनाव है जो अपने मन के दिखाए हुए रास्ते पर चलने की वजह से किया गया है | कितनी ही दवाइयां और कितनी ही यातनाएं झेलने के बाद भी ये दिल कभी कमज़ोर नहीं पड़ा |

आज जब सुबह आती है तो अपने साथ एक भविष्य की परछाई लेकर आती है,जिसे आँख बंद करके देखने पर पता लगता है कि कल ज़्यादा दूर नहीं है | एक कल जल्द ही आने वाला है | एक शांत और सुखद कल | एक ऐसा कल जहाँ पर हमें भी स्वछन्द होकर उड़ने और अपने सपनो के पैरों में पतंग की डोर बाँध कर छोड़ देने की आज़ादी होगी | एक कल जहाँ एक आदमी को दूसरे आदमी से सिर्फ उसका अंतर्मन देख कर प्रेम हो जायेगा उसके लिंग, चेहरे का रंग, उसकी फटी हुई जेब से झांकते उसके जाती प्रमाण पत्र से नहीं | एक कल जहाँ पर कपड़ों को लिंगभेद करने का एक ओछा माध्यम बनाने कि बजाय अपने भीतर के इनसान की आवाज़ दुनिया तक लाने का जरिया बना दिया जायेगा | एक कल जहाँ पर आँखें भेदभाव करने के लिए नहीं बल्कि किसी को प्रेम से एक नज़र भर देखने के लिए खुलेंगी और होंठ किसी से उनके अच्छे होने का सवाल पूछा करेंगे | एक कल जहाँ हम पुरुष रहते हुए भी एक पुरुष से प्रेम कर पाएंगे और पुरुष रहते हुए एक महिला की भाँती सज-संवर भी सकेंगे |

आप साथ रहिये | कभी एक श्रोता की तरह कभी एक पाठक की तरह | आप संघर्ष करिये इस ज़माने के खिलाफ और हम अपना संघर्ष जारी रखते हैं इस मानसिक गरीबी के खिलाफ | उस उदासी और घृणा के खिलाफ जो आपको भीतर से दीमक लगे दरवाज़े के जैसा खोखला करती जा रही है | और आप हमें कुछ भी बुला सकते हैं | लीला भी और लैला भी, लड़की भी औरत भी | मगर आप जब हमें 'माया' कहकर बुलाएंगे तो लगेगा कि हमारी पहचान किसी मानसिक कुंठा का कारण नहीं हो सकती | हमारी भी आँखों में उतना ही मानसून बसता है जितना आपकी आँखों में | हम भी आप ही की तरह बोल और सुन सकते हैं | हमें भी जीना है और हम जियेंगे | आप बस हमारे सांस लेने लायक जगह छोड़ दीजिये,जीने का तरीका हम खुद तलाश लेंगे |

खैर आप क्यों इन बातों में उलझ रहे हैं | आप ध्यान रखिये अपना भी और अपने दिल का भी | क्योंकि दिल के भीतर उम्मीद नाम की एक नन्ही सी चिड़िया रहती है | उस चिड़िया को ज़िंदा रखिये | और हाँ जनाब,अगर हो सके तो प्रेम में किसी और का होकर देखिएगा... एक छोटी सी कोशिश भी सराहनीय रहेगी,ये वादा है हमारा |         


तारीख: 09.06.2017                                                        राहुल झा 






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