संतोष

"सज रही गली मेरी अम्मा सुनहरी गोटे से .......सज रही..."  अश्लील हरकतें करते, सपाट छाती से बार बार पल्ला सरकाते सम्हालते ताली बजा बजा कर उसका साथी यात्रियों का ध्यान आकर्षित कर पैसे मांग रहा था.... बीच बीच में उसे भी टोहता जाता ,इशारा करता कि इस तरह करो और पैसे मांगो...साड़ी पहने, श्रृंगार किये वह अटपटा महसूस कर रहा था.. इस तरह करने में शरम भी आ रही थी.. फिर भी उसने कोशिश की ,दो बार गाने के प्रयास में पसीने पसीने हो गया और अगले स्टेशन पर ही उतर गया ..पीछे पीछे उतरा उसका साथी..       " अयहय, ये देखो छक्का होके औरत जात की तरह शरमा रहा है ..अरे भगवान ने ऐसा ही बना दिया तो ऐसे ही करना पड़ेगा ..इतराना ,नखरें दिखाना बंद कर और चल..."


वह रुआंसा हो गया, " मैं नहीं जाऊंगा ,मुझसे नहीं होगा"  
उसके साथी ने फिर ताली बजाई,  "लो और सुनो ,नही होगा...: बोल तो क्यों नहीं होगा ? अपना पेशा ही यही है, पेशे के लिए कोई ऐसे कहता है क्या ? ताली तो बजाना ही पड़ेगी ,हम तो पैदा ही ताली बजाने के लिए हुए हैं... चल"   उसने उसकी बांह पकड़ ली... उसने बांह झिटक दी, " मैं नहीं जाऊंगा.." और घर की तरफ भागने लगा.. भागते भागते मन भी बचपन की तरफ भागने लगा ..कानों में गूंजने लगा बच्चों का चिढ़ाना..


  "न लड़की न लड़का देखो आया छक्का"
  " न बंटे लड्डू न बजी थाली, गा गा के ये बजायेगा ताली"'     वो बुदबुदाने लगा ," क्यों बजाऊं मैं ताली,  नहीं बजाऊंगा ' 
उसे याद आने लगी अपने जन्म की घटना जिसे लेकर माँ और बुआ अक्सर बातें करती रहतीं थी.....


  बेहद उत्साहित थे माधवराव चौधरी यानी उसके पिता ..माँ अस्पताल में थी ..घर पे ढोल वाले ,मोहल्ले की औरतें व हिंजड़े घर का चिराग होने की आस में बधाई गा रहे थे,
     " अँगना हमारे आयो नन्दलाल, बाजत रुनझुन ठुमक ठुमक चाल , ग्वालन संग खाये छढ़ि चांदी के थाल,माखन लपटाए रह्यो स्यामल ते गाल, देखी देखी कान्हा की मोहनी सुरतिया, वारी वारी जाए जसोदा मैया ....' ढोलक की थापों के बीच उठते गीत औरतों व हिजडों की चुहलबाजी के बीच और भी रसिक हो उठे थे ...." जसोदा जी से हँस हँस पूछत दाई
          राते तो मैं लली जनाई ललन कहाँ से लाई..."


गाते बजाते सब बेसब्री से अस्पताल से खबर आने का  इंतजार कर रहे थे..सुषमा काकी गीत की कड़ियाँ बीच में ही तोड़ती कहती, " मेरो मन कह रहो है देखियो छोरो ही होगो पेट तो निकरों ही नहीं वाको.."
ललिता ताई फुसफुसाती ,  "पेट भरे न निकरों पर चेहरे पे  लुनाई खूब रही वाके ,छोरो होतो तो लुनाई न रहती, मुँह सूखा देवे हैं छोरे " 


" जाव दे या तो होइ छोरो या छोरी तीसरो तो कोई न होई न.."
पर सबको गलत साबित करते हुए चौधरी के घर इसी तीसरे को आना था...डॉक्टर भी हैरान थे पर बताना तो था ही  सीधे ही कह दिया, " चौधरी थारे घर छक्का पैदा हुआ है..."


दिल पे हाथ रखे चौधरी सकते में बैठे रहे... माँ की पीड़ा प्रसव पीड़ा से भी दोगुनी हो गई.. बधाई लेने बैठे हिंजड़े भी भौचक थे, समझ नहीं पा रहे थे बधाई न मिलने का गम करे या अपनी बिरादरी बढ़ने की खुशी..   चौधरी ने बधाई देने के बजाय कीमत ली और औलाद बेच दी.. माँ छटपटा गई, नहीं मानी और हिजड़ो की बस्ती जा कर अपनी औलाद वापिस ले आई.. ' अब जो है, जैसा है मैं ही पालूंगी ' बुआ का साथ मिला तो हिम्मत और बढ़ गई..


पर ये क्या इतना आसान था..सबसे पहले पिता ने साथ छोड़ा..माँ बुआ के साथ उनके दो कमरे के मकान में आ गई.. निम्न वर्ग के लोग आस पास का गलीच माहौल ,गन्दे और कुत्सित भावना वाले लोगों के बीच रोज ही मरता रोज जीता.. फिर समस्या थी नाम की..नाम क्या रखे लड़के का ! लड़की का ! फिर सोच विचार कर नाम रखा संतोष..अब जो भी है संतोष तो करना ही पड़ेगा..माँ बाहर जाने नहीं देती सबसे छुपा कर रखती….पर कब तक ?एक दिन सबके साथ खेलने की चाह में बाहर भाग आया ..पर कोई उसके साथ नहीं खेला उल्टा चिढ़ाने लगे..'आ गया छक्का , न बंटे लडडू, न बजी थाली.... '
भागते भागते आँखे भर आईं ,  ' नहीं बजाऊंगा ताली, क्यों बजाऊं ...क्या मुझे अच्छे से जीने का हक नहीं, क्या मुझे पढ़ने का हक नहीं, क्या मुझे इस समाज में रहने का अधिकार नहीं...?क्या गुनाह है मेरा ?भगवान ने मुझे पैदा ही क्यों किया ? इससे से तो अच्छा है मर जाऊँ ..' वह तालाब की तरफ भागने लगा.. कूदने ही वाला था कि किसी ने पकड़ लिया ..ये तो मोहन दादा है.. वह रोने लगा  ," मुझे मर जाने दो, मुझे नहीं रहना इस दुनिया में " पर मोहन उसे अपने घर ले गया.
 "" क्या कर रहे हो मोहन दादा ,छोड़ दो मुझे छोड़ दो मुझे घर जाने दो..." 


" क्या करेगा घर जाकर तू तो वैसे भी मरने जा रहा था नहीं जा रही थी.. ऐसे मरने से क्या फायदा किसी के काम आकर मर ना .." उसके शरीर को जकड़ कर उस पर हाथ घुमाते घुमाते वो बोला..


छटपटाते हुए वह चिल्लाया ,"'छोड़ दो मुझे वरना मैं जोर जोर से चिल्लाऊंगा "


"चिल्ला ...यहाँ कोई सुनने वाला नहीं है ." उसने एक हाथ से उसका मुँह बंद किया और अपना काम करता रहा.. वह छटपटाता रहा मोहन मनमानी करके ही माना..फिर तो ये आये दिन का किस्सा हो गया कभी मोहन,कभी बंसी,कभी राधे,कभी दिनेश ..वह छटपटाता घुटता पर कुछ कर न पाता..अकेले में घण्टों रोता.. कोई रोकता क्यों नहीं इन्हें, कोई बचाता क्यों नहीं उसे? इस प्रताड़ना से दुखी वह फिर मरने गया पर फिर बच गया..इस बार बुआ ने सम्हाला.. उसे पढ़ाई के लिए प्रेरित किया.. बच्चों व टीचर्स के मजाक उड़ाने ,चिढ़ाने तथा बार बार ये जताने पर कि ये जगह उसके लिए नहीं है, उसने पढ़ाई ही छोड़ दी थी..


अब फिर से पढ़ाई करना, फिर से सबकी चुभती नजरों को झेलना ,तानों की मार सहना ..पर बुआ ने हिम्मत दी तो उसने दसवीं की पढ़ाई शुरू की..न अंग्रेजी न हिंदी भाषा का ज्ञान न किसी अन्य विषय की जानकारी.. फिर भी जुट गया ' कुछ भी हो पढ़ना तो है ही..स्कूल में भी उसे अलग थलग ही रखा जाता.
बच्चे न उससे बात करते न खेलते..लड़कियां कहतीं,
"तू लड़का है लड़कों की सीट पर जाकर बैठ.."
लड़के कहतें ,"तू लड़की है लड़कियों की  सीट पर जा " उसे न लड़के बैठाते न लड़कियां ..उसे लड़के अच्छे नहीं लगते थे, लड़कियों के साथ वह सुविधाजनक महसूस करता पर उसका पहनावा व सूरत लड़कों जैसी थी तो लड़कियां उससे दूर ही रहती..एक दिन अचानक स्कूल में उसकी पेंट खराब हो गई लड़के लड़कियां पहले तो हैरान हुए फिर चिढ़ाने लगे, " लड़के जैसा दिखने वाला ये तो लड़की है आधा लड़का ,आधी लड़की.' उसे समझ नहीं आ रहा था कौनसे बाथरूम जाऊँ कोई उसे बाथरूम भी यूज़ नहीं करने देता..घर आकर भी वो बहुत देर रोता रहा


दूसरे दिन स्कूल में लड़के उसे चिढ़ाने लगे तो वह एक तरफ बैठ कर रोने लगा तब उसकी टीचर भारती मेम और मनीषा मेम ने पूछा ,क्या हुआ ?"
भरे गले से उसने कहा, " मुझे पढ़ना है पर यहाँ सब मुझे छेड़ते हैं, मज़ाक उड़ाते हैं, मुझे अच्छा नहीं लगता. पढ़ने में भी मन नहीं लगता.."
मनीषा मेम ने उसे समझाया, सांत्वना दी कहा कि वह इन बातों पर बिल्कुल ध्यान न दे अपना पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई में लगाये जो भी परेशानी हो तो उन्हें बताये वे उसकी मदद करेगी'
उसे अच्छा लगा. मेम ने उसका मजाक नहीं उड़ाया उसे दुत्कारा भी नहीं.. वह पढ़ने में मन लगाने लगा.

दर्द की कोई परिभाषा नहीं होती ,सबके अपने दर्द,अपनी अपनी व्याख्याएं.. संतोष का अपना दर्द था तो सुदेश का अपना..वह दिमाग से थोड़ा कमजोर था..कमी इसमें भी कमी उसमें भी तो जिन्हें लगता था कि उनमें कोई कमी नहीं है वे इन्हें चिढ़ाने, इन्हें नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते ..संतोष तो उनके मनोरंजन का साधन था ही,सुदेश भी एक तरह से उनका खिलौना ही था..मूर्ख,बुद्धू ,पागल और न जाने क्या क्या उपाधियां देते .कभी सर पे चपत लगा कर भाग जाते कभी पीठ पर धोल जमा कर. तब संतोष ही उसे सम्हालता ..उसे भी उसी का साथ अच्छा लगता.. कॉलेज में अगर उसकी थोड़ी बहुत किसी से दोस्ती थी तो वह था सुदेश.. दिमाग से कमजोर पर दिल से बहुत अच्छा.. एक वही था जो संतोष पे न हंसता न उसे चिढ़ाता..

एक वही था जो संतोष को जज नहीं करता था उसे संतोष समझता था ..तानों की चुभती निगाहों की तपती दोपहरी में राहत की छतरी था सुदेश. टीचर्स में मनीषा मेम के साथ भारती मेम भी उसे बहुत अच्छी लगती थी वे भी उसे इंसान ही समझती थी और सपोर्ट भी करती थीं . इसी तरह दिन गुजरते रहे..एक दिन जब वह घर लौट रहा था तो मोहल्ले के लड़कों के छेड़ने पर कि आ गया छक्का वो तिलमिला गया..घर जाकर उसने माँ से कहा कि ये सब लोग मुझे छक्का छक्का कहते हैं, मुझे अच्छा नहीं लगता"


यों तो माँ हमेशा उसके रोने या इस तरह की कोई बात करने पर उसे लाड़ कर सम्हाल लेती थी पर उस दिन जाने उसका मूड खराब था या और कुछ बात ..बड़ी ही कड़वाहट से बोली, " रंडी को रंडी नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे ?"  वो सन्न रह गया ..उधर कॉलेज में बच्चों का चिढ़ाना उस पर माँ के ये शब्द ! बेहद उखड़े मूड में वो क्लास में बैठा था.. मनीषा मेम ने पूछा तो रो दिया.." मैं क्या करूँ, क्या करूँ ?"
मेम ने तल्खी से कहा, " ये रोना धोना बंद करो,जो है उसे स्वीकार करो..सबको बता दो कि तुम क्या हो और क्या करना चाहते हो.. जिसको तुमसे बात करनी होगी करेगा नहीं करनी होगी नहीं करेगा.."
उसी पल,उसी क्षण जैसे बिजली कौंधी..उसने ठान लिया कि उसे ऐसा कुछ करना है कि लोग उसे उसके नाम से जाने ..न छक्का न किन्नर न कुछ और..


उस दिन उसने क्लास में सबके सामने खड़े होकर संयत स्वर में कहा , " हाँ मैं छक्का हूँ, पर मैं, मैं हूं ..मैं जो हूँ इसमे मेरा दोष नहीं है. मैं पढ़ना चाहता हूँ और पढूंगा..जिसको मुझसे बात करनी है करे नहीं करनी है नहीं करे पर मैं ऐसे ही रहूँगा. आगे से किसी ने मुझे छेड़ा या चिढ़ाया तो अच्छा नहीं होगा.." 


पूरी क्लास हतप्रभ रह गई .बाद में दोस्त तो ऐसे कुछ बने नहीं पर फिर किसी ने उसे छेड़ने ,चिढ़ाने या मज़ाक उड़ाने की हिम्मत नहीं की.. वह पढ़ाई में डूब गया साथ ही अपने जैसे लोगों के अधिकारों के लिए एक मिशन की तैयारी करने लगा..
और जब उसके कॉलेज ने उसे विद्यार्थी रत्न अवार्ड से सम्मानित किया तो उसे दोहरी खुशी हुई ,एक सभी छात्रों के बीच सम्मानित होने की दूसरे अपने पिता द्वारा स्वीकार किये जाने की..उसकी परेशानी का ख्याल कर जब उसके कॉलेज में उसके लिए अलग से बाथरूम बनवाया गया तब उसे लगा उसने जिंदगी का एक संघर्ष और पार कर लिया..फिर उसने अपने जैसे लोगों की समस्याओं ,अधिकारों व उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने हेतु सुझावों के साथ पेपर तैयार किये..उसका मुख्य उद्देश्य है किन्नरों को पढ़ाना तथा समाज से जोड़ना और समाज से जोड़ने के लिए उन्हें शिक्षित करना आवश्यक है.. संतोष के आज इंटरव्यू लिए जाते हैं, उसके भाषणों द्वारा छात्रों को प्रेरित किया जाता है.


राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय विभिन्न संस्थाओं द्वारा आयोजित सेमिनार में वह किन्नरों के मौलिक अधिकार, उनकी शिक्षा, शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना, सेक्सुअल हरैसमेंट इत्यादि पर पेपर प्रेजेंट करता है.. उसका मिशन है किन्नरों को उनके अधिकार व समाज में एक अच्छी जगह व पहचान दिलवाना ..


आज यूनेस्को द्वारा आयोजित सेमिनार में स्पीच देते समय,किन्नरों के अधिकारों व मुख्य रूप से शिक्षा की मांग करते समय उसका चेहरा भरपूर आत्मविश्वास से दमक रहा था.. आज वह बचपन में पुकारे जाने वाला छक्का नहीं संतोष था..आज पूरी दुनिया उसे छक्का या हिंजड़ा नहीं बल्कि उसके नाम से जान रही थी.. इसी संतोष ने अपनी कमी को अधूरेपन को अधूरा नहीं रहने दिया बल्कि देश के साथ दुनियाभर में अपना नाम कर माँ, बुआ व कहीं न कहीं पिता को भी संतोष दे ही दिया था.....
 


तारीख: 29.09.2019                                                        ममता मेहता






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