उड़ गई माँ की परी

रोजाना की तरह ही आज सुबह भी मैं पैदल घूमने के लिए अपने घर सेबनिकला। अपने निवास से कुछ ही दूर, जहाँ से दिखती है एक मनोरम तालाब और सुंदर गार्डन, यहाँ रोजाना सुबह-शाम बहुत लोग आया करते है, मेरी भी आदत है, सुबह यहां आने के लिए चल ही रहा था कि अचानक मेरी नज़र एक लिफाफे में गया, जो बीच रास्ते में ही पड़ा था। न जाने कितने गाड़ी उस लिफाफे से होकर गुजरे होंगे,जिसमें अनेक पहिए के निशान लगे थे।
 
लिफाफा धूल में सना गन्दा हो गया था, एक पल के लिए उठाने का भी मन नहीं हुआ, सोचता रहा और अंत में उठा भी लिया, लिफाफे को धीरे-धीरे खोलते हुए आगे की ओर चलने लगा। लिफाफे के अंदर एक कागज़ के दोनों तरफ कुछ लिखा हुआ था, तो मैंने उसे पुनः वापस लिफाफे में डालकर जेब में रख लिया।
 
   टहलते-टहलते मैं काफी दूर जा चुका था तो शरीर में थकान महसूस होने लगा। रास्ते के किनारे में एक विशाल बरगद वृक्ष था और उसके चारों ओर निगम के द्वारा चबूतरा बनवाया गया था, जिसमें अधिकतर वृद्ध लोग सुबह-सुबह बैठकर आपस में चर्चा करते रहते थे। मैं भी पेड़ के छाव में बैठ गया। 
 
आराम करने के बाद मैं अपने घर की ओर वापस चलना शुरू किया। चलते-चलते सोच रहा था कि इस लिफाफे के अंदर रखे पत्र को पढूं या न पढूं। आखिरकार मन में धीरज नहीं रहा तो लिफाफे को खोला और उस पत्र को निकाला। 
 एक बेटी के द्वारा अपने बूढ़ी माँ को लिखा गया पत्र था। गरिमा 2 माह से माँ से दूर एक छात्रावास में रहकर एम.ए. की पढ़ाई कर रही थी। एक बेटी अपने परिवार और माँ-बाप से दूर रहने में हालत क्या होती है? शायद इस बात का अंदाजा इस पत्र से लगाया जा सकता है...
 
 माँ सादर प्रणाम,
       आपकी तबीयत ठीक है और आप सकुशल है,ये जानकर मुझे अत्यधिक प्रसन्नता हुई। रोज आप सही समय में दवा खा लेना और सुबह-शाम  व्यायाम करना मत भूलना और पापा को भी मेरे तरफ से प्रणाम कहना,भाई रोज स्कूल जाता है कि नहीं, उनकी पढ़ाई और शरारती बच्चे का ध्यान रखना, किसी भी प्रकार से आगे की पढ़ाई में कोई कमी मत करना।
 
माँ! आज आपकी बहुत याद आ रही है। मैं आपसे और पापा से बहुत प्यार करती हूँ और आपने भी मुझे खूब प्यार दिया है। आप लोगों को छोड़कर दूर जाने का मन नहीं होती, लेकिन क्या करूँ माँ मुझे जाना होगा। आपकी स्नेह और पापा की परवरिश को, मैं सात जन्मों तक नहीं चुका सकती। 
 
आप रोज सच गुड़िया कहकर प्यार करती थी न माँ, सच कहती थी आप। मैं दुनिया के आगे  केवल गुड़िया ही तो हूँ, लेकिन मुझे यह पता नहीं था कि उस गुड़िया से खेलने वाला राक्षस होगा। आज आपकी यही गुड़िया कलेक्टर तो बन न सकी, लेकिन लोगों की हवस का प्यास जरूर बुझा गई माँ...
 
माँ इसमें शब्दों की गरिमा नहीं है, यह पहली मर्तबा है जब मैं आपसे ऐसी बातें लिख रही हूँ, माँ आप मुझे पिछले 10-12 दिन से एक ही बात बोल रही थी, कि तुम इतनी उदास क्यों हो? तुम मुझसे कुछ छुपा रही हो। हाँ माँ, मैंने आपसे एक बात छुपा रखी थी, जिसे आज आपको दिल में पत्थर रखकर बताने जा रही हूँ... आपको यकीन होगा नहीं, लेकिन यकीन करना होगा माँ और वादा करो मेरे बीना अच्छे से पापा और भाई के साथ जीवन जिओगी।
 
     माँ! मैं अपने कॉलेज के एक लड़के से बेतहाशा प्यार करती थी और धीरे-धीरे मुझे लगने लगा था की वह भी मुझसे बहुत प्यार करता है, लेकिन उस पर इतना ज्यादा विश्वास करके मैंने बहुत बड़ी गलती की। वहीं एक गलती आज मेरे लिए शाप बन गयी, उसने मेरी जिंदगी को नरक बना दिया,आप लोगों से मुझे दूर कर दिया। काश! मैं उन राक्षसों का संहार कर पाती माँ...
 
पता है माँ!... एक दिन उस लड़के ने मुझे घूमने जाने के बहाने शहर के मध्य स्थित तिराहे पर सुबह मिलने को कहा। मैं भी खुशी-खुशी नए कपड़े पहनकर मिलने चली गई। योगेश, हाँ माँ उस लड़के का नाम योगेश है जो दिखता तो शांत-सरल स्वभाव का है, लेकिन अंदर से एक दैत्य था। जैसे ही मैं तिराहे पर गई, वह पहले से वहाँ पहुंच चुका था। 
 
पहले जब भी उनके पास जाती तो उसके आंखों में अपनापन का भाव झलकता था,लेकिन उसकी आंखें आज कुछ और बयां कर रही थी। उसने मुझे दिखावटी मुस्कान भरते हुए कहा,'आज हम शहर से 20 किलोमीटर दूर सघन वन के बीच मौजूद सुरम्य झरने देखने चलेंगे और सूरज ढलने से पहले घर वापस आ जाएंगे। 'मैंने भी उसके बातों पर भरोसा करते हुए हामी भरते हुए बाइक में बैठ गयी। 
 
पहले जब भी हम साथ होते या कहीं घूमने जाते थे तो  प्रेम रूपी बदल घोर काली घटा के साथ बरसने लगता था, लेकिन पता नहीं आज क्यों वह बादल न बरस रहा था और न कहीं दिखाई दे रहा था। जब हम झरने के पास पहुंचे तो मैं योगेश से बात करने की प्रयास की, लेकिन पता नहीं उसके मन में क्या चल रहा था, उन्होंने मुझसे दूरी बनाना शुरू कर दिया। उस झरने में निरन्तर बहते हुए पानी के साथ मेरा प्यार भी बहता हुआ महसूस होने लगा।
 
बेरुख़ मन से घूमने के बाद जब हम वापस लौट रहे थे तो झरने से महज 2 किलोमीटर दूर जंगल बीच मौजूद एक खंडहरनुमा झोपड़ी में ले गया और मैं उनको कुछ बोल पाती इससे पहले चार हट्टे-कट्टे लोग जबरजस्ती अंदर घुस आए। मैं एकदम से घबरा गई। मन में तारामंडल घूमने लगी। फिर मैंने योगेश का हाथ ज़ोर से पकड़ लिया, लेकिन उससे कहीं ज्यादा ज़ोर से झटका देते हुए अपना हाथ हटा दिया और फिर योगेश हंसते हुए उन लोगों से हाथ मिलाते हुए झोपड़ी से बाहर निकलते हुए कहा, 'मेरे आते तक इन दोस्तों का मनोरंजन करना' कहते हुए चला गया। जैसे ही योगेश बाहर निकला वो चारों दोस्त मुझ पर  भेड़िये की तरह टूट पड़े। 
जब एक अकेला और असहाय मनुष्य पर चार भेड़ टूट पड़े तो उनका बच पाना मुश्किल होता है, लेकिन यहाँ के भेड़िये मनुष्य को जिंदा नहीं मारते लेकिन जीवित मनुष्य को जीवनभर के लिए मार डालते हैं। मैं चीखती चिल्लाती रही लेकिन उन शैतानों को कोई फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि इस वीरान पड़े जंगल में हम पांच लोगों के सिवाय कोई था ही नहीं। फिर भी मैं उन लोगों से जूझती रही।
 
आधे घण्टे तक मैं बिलखती रही, शोर करती रही और अंत में अपने आप को कमजोर पाकर चुप बैठ गयी, लेकिन इन पापी भेड़ियों ने मुझे खाना नहीं छोड़ा। महाभारत में जिस प्रकार श्रीकृष्ण ने द्रौपदी के  चीरहरण के समय चमत्कार किया था उसी आस के साथ मैंने भी श्रीकृष्ण को आवाज लगाई लेकिन वहाँ श्रीकृष्ण के जगह दुःशासन प्रकट हुआ था। एक घण्टे बाद योगेश झोपड़ी के अंदर प्रवेश किया और उसके तुरंत बाद एक दोस्त योगेश को कुछ पैसे देते हुए गरिमा को कहा, अगर यह बात किसी को बताई तो यह वीडियो वायरल कर देंगे और तेरी परिवार को तबाह कर देंगे। मैं असहाय एक किनारे रोते हुए पड़ी रही और योगेश हंसते हुए पैसे गिनने में लग गया।
 
अब आप ही बताओ माँ! क्या मुझे ऐसे में जीना चाहिए? क्या आप मेरे द्वारा की गई इस गलती को कभी माफ कर पाओगी, लेकिन क्या करूँ माँ इस परिस्थिति के आगे मुझे नतमस्तक होना पड़ा। मैं चाह कर भी अपने आपको रोक नहीं पाई और इस दलदल रूपी नदी में बह गई। आपने मेरे लिए क्या-क्या सपने नहीं देखी होगी माँ लेकिन उन सपनो को पूरा करने में मैं असफल रही। 
 
यह खत जब आपके हाथों में होगी तब तक मैं आपसे बहुत दूर जा चुकी होंगी,तब चाहकर भी आप मुझे नहीं ढूंढ पाओगी। सिर्फ मेरी यादों के सिवाय आपके पास कुछ नहीं होगा।
   आपकी गुड़िया...
 
मैं इस खत को पढ़कर एकदम से स्तब्ध हो गया और उस लिफाफे में लिखे गए पते पर पोस्ट कर दिया।


तारीख: 18.08.2019                                                        दीपक पटेल






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