बचपन-बुढ़ापा

बचपन-कचपन, बुढ़ा-पकपन,
सरल-सहज, व्यथाएं पचपन,
नागर निडर, हियाय खनखन
चापर चपल, पिराय तनमन।

डग-भर डगर, थकाये आँगन,
नटवर नज़र, दुखाए दामन,
अल्लड़ मस्त, संभाले जरा-धन,
काफिर-कहर, सहारे अनबन।

रंग बिरंग, मन फीके सावन,
अंग मलंग, लाठी के आवन,
ढंग-बिढंग, विराने दरपन,
संग-तरंग, विचारे पलछिन।

कल-कल किलक, कराहे कण-कण,
मादक मदन, मनाहे मन-मन,
सरपट सहर - सकल संसारा,
अंग अपंग - पसारे पसरन।

मावठ मगन, मज़ार-ए-माघन,
सागर शरद, उजाड़-ए-बागन,
दिनकर दमन, गुजारे गिन-गिन,
जग-जग जतन, जुहारे जन-जन।

कल्पित कल्प, विकार-ए-बकपन,
चिंतन अल्प – वाह रे लड़कपन!
जर-जर हाल, विचार विचारा,
दुख-सुख दरख, बुढ़ापा-बचपन।


तारीख: 06.06.2017                                                        एस. कमलवंशी






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