भ्रूण हत्या

बहुत पढ़ा था, बहुत सुना था किस्सा
हत्या और हत्यारों का।
पर समझ ना पाया कैसे एक बाप
हत्या करता है अपने अजन्मे बेचारों का।

पुत कपुत बहुत सुना था, रह गया था सुनना 
कातिल माँ -बाप।
बेटी अगर इतनी ही बुरी है, 
अगर लोग समझतें हैं उसको शाप,
सोंच जरा ऐ बुध्दिमानों, कहाँ से आये हम और आप?

भूर्ण हत्या से बढ़ कर जग में पाप ना कोई दूजा है,
कन्यदान से बढ़ कर जग में ना कोई यज्ञ ना पूजा है।
ऐसे सम्दिल माँ-बाप का, सोंच जरा पारिनाम क्या होगा,
ऐसे नीच विचार वालों का, 
क्या अन्तर घर और कब्रिस्तान मे होगा।

भरले अंक, मिटा कलंक
बेटा हो या बेटी हो।
बिन बेटी, सिर्फ बेटों से बढ़ता ना परिवार है,
तभी तो बेटियों को लक्ष्मी और शक्ति रुप मे,
पूजता सारा संसार है।
बेटा अगर तिलक है सर का तो बेटी गले का हार है।


तारीख: 29.09.2019                                                        राकेश कुमार साह






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