बस कुछ

कुछ आंसू थे इन आँखों मे, बहना उनकी तासीर मे था,
हम समझ ख़ुशी के बैठे थे, ग़म के वो नाम लिखाये थे

कुछ ख़ुशियाँ थी इस आँचल मे, जाना उनकी तक़दीर मे था,
हम मान के अपना बैठे थे, वो मेहमान बनके आये थे

कितना खोया ? कितना पाया ?
कितना माँगा ? कितना लाया ?
ना कोई गणित हुआ इसका, ना कोई समझ इसे पाया,

क्यों चाहें ओर क्यों ना चाहें, इसका कोई उत्तर दे ना सका,
जो पाया है वो अपनायें, किसी और का है जो वो ना चाहें,
कैसे इस दिल को समझायें, क्यों समझ के भी ये समझ ना सका 

कुछ लम्हे थे इस किस्मत मे, जाना उनकी तक़दीर मे था,
हम समझ के साथी बैठे थे, वो झोका बनकर चले गए

कुछ सपने थे इन आँखों मे, रहना उनकी आदत मे था,
वो कल भी थे, वो आज भी हैं,
हरदम वो साथ निभायें हैं |


तारीख: 06.06.2017                                                        पूजा शहादेव






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