दो पल के अवकाश

 

आज कहीं मत जाओ 
आज बैठे रहो सकाश 
या मुझको वापस कर दो मेरे 
दो पल के अवकाश 

और नहीं कुछ था मेरा 
बस थोड़े से काश 
और थोड़ा आकाश 

बहुत विमुख था, यौवन मेरे सम्मुख 
लेकिन मेरा था 
मैं जिसमें टहला करता था 
बहुत बड़ा वो घेरा था 

मेरी सीमा छोटी कर दो 
अपने छोटे घेरे में 
या सारे घेरे ले जाओ 
ले लो मेरा पाश 

मेरे नयन जलाशय में 
बिंब जगत के आते हैं 
चलचित्रों से जीवन के 
सब साये मंडलाते हैं 

निमिश नयन मैं कभी कभी 
उनको देखा करता हूँ 
भगदड़ करते महानगर 
जब आँखों में बस जाते हैं 

दर्पन में मैं कभी कभी 
भीड़ के जैसा दिखता हूँ 
सपने मोल कराने को 
कितने हाथों बिकता हूँ 

मेरे चुप साननाटों में 
जाने किनकी बातें हैं? 
निर्जन कहीं नहीं रहता 
जाने किनके नाते हैं? 

बोझिल मन मैं अब भी अपने 
गाँव देखा करता हूँ 
ख़ालीपन के तर्क वितर्क 
कंकड़ सा फेंका करता हूँ 


हिलते पानी में थोड़ा 
हिलता हूँ, अच्छा लगता है 
छोटी छोटी लहरों से 
मिलता हूँ, अच्छा लगता है 

कृपण मैं अपने पल छिंनों को 
पन्नों में संजोता हूँ 
अगली भोर मैं निश्दिन लेकिन 
पिछली संध्या खोता हूँ 

सारी जनता ले जाओ 
करदो सबको निराश 
पर मुझको वापस करदो मेरे 
दो पल के अवकाश 

या आज कहीं मत जाओ 
आज बैठे रहो सकाश ...
 


तारीख: 01.08.2017                                                        फ़रह अज़ीज़






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