दोहे रमेश के


मातु शारदे को सुमिर , .....लिखे लेखनी छंद। 
भाव शब्द कुसुमित हुए , बिखरा मधु मकरंद।।  

काँटों-सा चुभता रहे,जीवन का उद्यान। 
सींचे पेड़ बबूल का, .जब कोई इंसान।। 


रूप- रंग को देखकर,…नहीं बनाना मीत। 
सोना हो सकती नहीं,कभी धातु हर पीत।। 

होता है हर वस्तु का, अपना अलग प्रयोग। 
आता लोहे की जगह, कब सोना उपयोग ।। 

वहाँ सफल होती नहीं, पूजा और नमाज। 
जहाँ बिना सदभाव के,जीवित रहे समाज।। 


सी सी टीवी कैमरे, इनका नहीं जवाब।
दुर्घटना के वक्त ही, रहते मुए  ख़राब।।


दिल में जिसके पाप का ,होता रहे निवेश। 
कैसे जाएँ द्वार पर,......उसके बता रमेश।। 

ज्ञानी का लगता वृथा,.....लिया हुआ सब ज्ञान। 
दिया नहीं यदि और को,उसमें से कुछ दान।। 

कह पाऊँ वो ही नहीं, .....कहनी है जो बात। 
फिर तो करना व्यर्थ है,जग जाहिर जज्बात।। 

नहीं दिया जब तृषित को, पानी एक गिलास। 
व्यर्थ और पाखण्ड तब,.लगता है उपवास।। 

करे प्रदूषण पर अमल,सही शीघ्र सरकार। 
दूषित नीर समीर का, तब होगा उपचार।। 

चोला देना पाप का ,.मन से प्रथम उतार। 
मुमकिन नश्वर देह का,तब होगा उपचार।। 


तारीख: 20.03.2018                                                        रमेश शर्मा






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