हे मेघा! पानी बरसा दो

नदी, जलाशय सूख गए

मानो पानी से रूठ गए

जीव जंतु क्या, मानव भी

प्यास से माथा पीट रहे।।

 

चारा, घास सब सूख गए

मानो हरियाली से रूठ गये

गाय के थन में दूध नही

बछड़ा भूख से तड़फ रहा।।

 

कर्ज़ भार से दबा है कृषक

बीज के पैसे नही है घर पर

बटुए में खटमल दौड़ रहे

नैतिकता पर फिर भी अड़ा रहा।।

 

परिश्रम करता ख़ुद में रहता

दीन हीन समझ निज सहता

जुताई,बीज,सिचाईं,खाद

निराई,मड़ाई महज़ अवसाद।।

 

घर में बेटी, शादी की चिंता

दहेज़ बना फाँसी का फंदा

पढ़ाई की चिंता सताती

रात में भी नींद नही आती।।

 

घनघोर घटा गरजो बदरा

मूसलाधार बरसो बदरा

बिन गरजे सदा बरसे

आज गरज़ बरसो बदरा ।।

 

किसान ख़ुशी से सोयेगा

हृदय प्रफुल्लित होयेगा

आँख ख़ुद बख़ुद भरता है

जब संघर्ष मसीहा जगता है।।

 

यह पत्र महज एक पत्र नही

तपस्या की एक गाथा है

हे मेघा! पानी बरसा दो

सूखे अधरों को अमृत दो।।
 


तारीख: 06.07.2019                                                        ज़हीर अली सिद्दिक़ी






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