जना चाहे माँ ने मुझे पर अंश तेरा भी मुझमें समाया

जना चाहे माँ ने मुझे पर अंश तेरा भी मुझमें समाया 
माँ ने संभाली घर की कमान तो तूने दुनिया का भार उठाया |
चूं चूं करती, आ रि आ निंदिया जैसी लोरियाँ सुना 
जिसने बचपन में एक मधुर स्वपन सा सुलाया || 


लिख रही हूँ आज यह पहली बार कि 
एक पिता के महत्तव और बलिदान को हर कोई न समझ पाया |
बचपन से लड़कपन तक सब फरमाइशों को जिसने निभाया 
गणित का जोड़-घटाना हो चाहे पहाड़े जिसने कंठस्थ कराया |


रोज़ रोज़ यह चीज़ खत्म हो गयी 
ले कर आना बब्बा याद कराया |
गाल पे पड़े नील के निशान को देख मन जिसका घबराया,
फ़ौरन स्कूल जाकर टीचर को जिसने है हड़काया |


शिक्षा की ओर बढ़ते हुए कदम में जिसने प्रोत्साहन दिखाया |
बोर्ड परीक्षा, ट्यूशन हो चाहे कॉलेज का दाखिला या कोई साक्षात्कार 
जिसने हर अवसर में साथ निभाया ||


बुनियाद इतनी मज़बूत बनाई कि ये कदम आज भी नहीं हिचकते हैं |
हम बड़े हो गए तो बुज़ुर्ग बनकर दोस्ती का हाथ बढ़ाये खड़े हैं ||
बचपन में जो मूछें हटा देने पर न आते थे पहचान |
आज समय और अनुभव की सफेदी में भी दिखती है वही निश्छल मुस्कान ||


बेटियों को भी बेटों बराबर दिया जिसने सम्मान |
अपने आदर्शों, परोपकार और अनुभवों से जिसने हमें किया धनवान ||
गर्व है इस परवरिश कि बुनियाद पर जिसने जीवन इतना उज्जवल बनाया | 
क्या होता है पिता शब्द का अर्थ अंततः आज समझ आया ||


तारीख: 12.08.2017                                                        राशि पन्त






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है