कलयुगी बेटे कैसे कैसे 


माँ-बाप बेटे को बडे नाज से पालते पोसते हैं
वहीं बेटे बडे होकर माँ-बाप को ही कोसते हैं।
जिस पिता की उँगली पकडकर बेटे चलना सीखते हैं
बुढापे में जरा पिता लडखडाए तो वही बेटे उसपर चीखते हैं।


जिन कंधों पर वो बचपन में खेला करते हैं
बडे होकर उन्हीं झुके कंधों को संभालने से डरते हैं।
पिता सोचता है बडे होकर बेटे मेरा सहारा बनेंगे
बेटे बडे होकर सोचते हैं अब तो बस इनसे दूर रहेंगे।


माँ-बाप सुनाना चाहते हैं उन्हें बुढापे का किस्सा
पर उन्हें तो बस चाहिए उनकी जायदाद में अपना हिस्सा।
पिता चला जाता है एक दिन कहकर अलविदा
अंतिम क्षण में एक सवाल बच्चों क्या थी मेरी खता।


माँ बेचारी बेटे उसे चैन से जीने नहीं देते हैं
प्यार स्नेह तो दूर दो वक्त का खाना तक नहीं देते हैं।
जिस माँ के हाथ से खाना खाकर बडे हुए
अब उस माँ को कोई ना छुए। 


आज के युग में कलयुगी हैं बेटे कैसे
माँ को खाना खिलाने के बदले माँगते हैं पैसे।
एक दिन माँ भी चली जाती है तब भी नही होता बेटों में कोई सुधार
कहते अंतिम संस्कार कैसे करें पैसे माँगते फिरते हैं उधार।
लानत है ऐसे बेटे पर अपने किये से न बच पायेगा
एक बात वो भूल गया कर्मों का फल यहीं पायेगा।
 


तारीख: 05.08.2017                                                        विशाल गर्ग






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