क्लांत

सूख गए मानस  डूब गए हंस

अपने ही हाथों  रचे विध्वंस

 

गूथ नहीं पाया मन मनकों में वंदन

आरती के कंठ में  गूंज रहे क्रंदन

 

झर-झर कर फूलों ने बीजे एकांत

भीग गयी कलियों ने मूंदे दृग क्लांत

 

गुरुतायें ढो-ढो कर उभरे स्कंध

सेतुओं को तोड़कर बहते संबंध

 

रुकरुक कर कलरव यों करता बन-पांखी

जैसे मौन ढोती हों बातों की बैसाखी

 

खींचते हैं बार बार सम्मोहते गह्वर

डंक मार जाते हैं ज़हरीले मंतर


तारीख: 17.12.2017                                                        राज हंस गुप्ता






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