मैं और मेरा मैं


चल रहा हूँ मैं, चलता ही जा रहा हूँ
मेरा मैं भी चलता जा रहा है
मैं कहाँ कहाँ जाऊँगा, कहां पहुंच पाऊँगा
मेरा मैं जहाँ जहाँ जाएगा
साथ साथ जाऊँगा


मैं रुक गया
मेरा मैं नही रुका
मैं थक कर चूर हो गया
मेरा मैं नही थका


ये किनारे जो आसमान ने सम्भाले हैं
मेरे मैं के लिये ही तो सारे हैं
थक कर गर गिर जाएगा
तब कहीं जाग पाएगा


पा जाएगा कुछ तो ऐसा
जो अंत:करण को सक्षम बना देगा
कदमों के द्वारा चली दूरी को बताएगा
मेरे “मैं” को  मुझसे निकाल पाएगा


मेरे दर्प को नाप कर
मुझे चेतना दे पाएगा
मै ऊँचा उड़ रहा  हूँ
वो आसमान अपने किनारे खोल कर
मेरे पंखो को नोच कर
मुझे अपने मे समा लेगा
मेरी औकात बता देगा


सदा हरियाली मे झूमने वाले “मै” को
पात विहीन होने का आभास दिलाएगा
निशान पक्के कहीं खो गये
जो पीछे छोड़ आया था


उसका स्पष्ट अहम निकाल पाएगा
बहुत कुछ बटोर कर रख आया था
वो सब अपनी जगह पहुँचाएगा
रास्ते मे जरूरत के लिये
बहुत कुछ लेकर चला था
लेकिन सब कुछ गवा आया
आसमान ने अपने किनारे खोल कर
मुझे और मेरे “मैं” को समेट लिया
 


तारीख: 18.08.2017                                                        किरण शर्मा






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