मैं ही हूँ स्वर मैं ही वीणा

मैं ही हूँ स्वर मैं ही वीणा
मैं ही हूँ झंकार हृदय की
मैं ही सप्त सुरों की सरगम
मैं ही ताल बना सुरलय की
मैं ही संस्कार जीवन का
मैं आचरणजन्य संस्कृति हूँ
मैं ईश्वर की अनुपम कृति हूँ.....

मैं ही आलम्बन उद्दीपन
मैं ही प्रेम प्रभाव बना हूँ
मैं अनुभाव विभाव मिलाकर
निज संचारी भाव बना हूँ
मैं ही हूँ श्रृंगार मदन का
मैं ही प्रथम प्रेम की रति हूँ
मैं ईश्वर की अनुपम कृति हूँ.......

मैं ही प्राण जीव का प्रण हूँ
मैं विस्तार बना हूँ तन का
मैं ही बुद्धि चित्त भी मैं हूँ
मैं ही अहम् भाव हूँ मन का
मैं ही हूँ स्पन्दन उर की
मैं ही इन श्वासों की गति हूँ
मैं ईश्वर की अनुपम कृति हूँ.....

मैं ही करुणा दया सिंधु हूँ
मैं ही हूँ प्रेमाश्रु विकल से
ईशकृपा से जो बह निकले
मैं अभिमंत्रित हूँ उस जल से
मैं आरम्भ अन्त भी मैं हूँ
मैं अविराम कभी मैं यति हूँ
मैं ईश्वर की अनुपम कृति हूँ......

मैं गुणगान बना ईश्वर का
मनभावन भावना भजन की
मैं ही रामनाम संकीर्तन
मैं ही पावन अग्नि यजन की
मैं उपराम हुआ विषयों से
मैं जग से जीवन उपरति हूँ
मैं ईश्वर की अनुपम कृति हूँ......

मैं हूँ श्लोक मन्त्र भी मैं हूँ
मैं महिमा हूँ प्रभुप्रसंग की
मैं ही माला हरि सुमिरन की
मैं ही अविरल धार गंग की
मैं ही हूँ कल्पना सृजन की
मैं ही गीतों की अनुमति हूँ
मैं ईश्वर की अनुपम कृति हूँ.....

मैं रामायण वाल्मीकि की
प्रथम वेद हूँ वेदव्यास का
नीति संहिता याज्ञवल्क्य की
रघुवंशम हूँ कालिदास का
मैं ही गीतासार कृष्ण का
मैं ही पावन मनुस्मृति हूँ
मैं ईश्वर की अनुपम कृति हूँ.....
                  


तारीख: 17.03.2018                                                        राघव शुक्ल






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