मंदाकिनी

सपनों की नगरी में मेरी रहती है मंदाकिनी।
हूबहू लगती है जैसे चन्द्रमा की चाँदनी।
सुन कर स्वर मधुरिम उसके खिल उठता है रोम रोम।
जब मधुर अपने कंठ से वो छेड़ती है रागिनी।

साज के श्रृंगार के विषय से वो अनजान है।
सजने को सँवरने को बस उसकी मुस्कान है।
देखकर लगती है जैसे स्वर्ग की हो अप्सरा।
विचार की व्यवहार की उन्नत उसकी उड़ान है।
अलौकिक हैं चक्षु उसके जैसे कि हो कुरंगिनी।
सपनों की नगरी में मेरी रहती है मंदाकिनी।

प्यार समाए है खुद में अनंती लाजवंती वो।
रौशनी बिखेरती चहुँओर बसंती जयंती वो।
रहती है खामोश अक्सर नीरवता की मूरत सी।
गंगा सी पवित्र है सतवंती वैजयंती वो।
चलती है बलखाती जैसे लहरों की तरंगिणी।
सपनों की नगरी में मेरी रहती है मंदाकिनी।


तारीख: 06.06.2017                                                        विवेक सोनी






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