सपने बेकल मेरे हुए

वेदना ! मन छोड़ दे
भेदना ह्रदय मेरे
न शस्त्र तेरा चल सके
देह धातु की मेरी.

ना बहूँ मैं धूल में
ना मलूँ मैं धूप में
पार कर वो आइ हूँ
जो डटे न शूल मैं.

भर घाव भी जाये मुझे
न आस ना ही चाह है
दम लगा तू रोक ले
मेरी यही तो राह है.

घबरा गया समय क्या तू
देख मेरी चाल को
न रात पाएगी सुला
इस सूर्य के कपाल को.

अवगत कराऊं मैं तुझे
निश्चय अटल मेरे हुए
न सूर्य डूबे अब कभी
सपने बेकल मेरे हुए.


तारीख: 06.06.2017                                                        वर्षा चौकोटिया ‘यवनिका’






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है