पिता

तुम्हे अपने चुनाव पे ऐतबार है,
तुम्हारे पिता को 
अपने परवरिश पर स्वाभिमान है,
अंतर है ऐतबार और स्वाभिमान में,
बहुत कुछ,
स्वच्छंदता और स्वतंत्रता जैसा।


मैं मानता हूँ कि यह,
तुम्हारे चुनने की स्वच्छंदता है,
जो संचित है तुम्हारे मस्तिष्क के क्रोड में,
कहीं-न-कहीं आदिम सभ्यता के प्रारम्भ से,
पर शायद तुम भूल बैठी,
संबंधों में भाव-प्रवणता है पहले से,
कहीं ज्यादा आवेगमयी।


लाँघ दिया देहरी ,तुमने
उस प्रेमी पिता का, मरोड़- हृदय उसका,
चूर-चूर कर दिए सपने उसके,
जब विदा करता निज-हाथों से तुम्हे,
समझ अपनी लाडली।
स्नेहिल थी तुम, उसकी पत्नी से भी कहीं ज्यादा,
जब आयी थी गोद में पहली-बार उसके।


आतुर रहता था,
वह तुम्हारी दंतुरित मुस्कान का।
पहली-बार!
झटक कर उसके सपनों को,
थाम लिया तुमने किसी ऐसे पुरुष का हाथ,
क़ि मर जाये सुनते ही वो पिता तुम्हारे,
जिसके हर भावी ह्रदय में,
तुम्हारा स्थान ऊंचा था,पुत्रों से भी,
कहीं अधिक और कोमल ।


संभाल नहीं पायी तुम अपने मन के,
इस क्षणिक परिवर्तन को,
बहक चली यंत्रवत दूसरे सभ्यता क़ी नक़ल पर।
मैं अब भी मानता हूँ,
क़ी यह समाज घोर पुरुषवादी है,
पर पिता तो तुम्हारा है।


कभी पूछा उसके ह्रदय से?
क्या बितता होगा, जब 
माँ तुम्हारी देती है बढ़ावा तुम्हारे अनुजों,अग्रजों को
तुमसे कहीं बढ़कर , 
तब रोता होगा मौन ह्रदय उसका।
जब प्रदत क़ी जाती होगी उनको आजादी,
तुम्हे किसी बिंदु पर कमजोर पाकर
तुमसे बहुत-बहुत ज्यादा।
महसूस किया है,कभी?
वह रोता है भीतर-से नाजुकपन पे तुम्हारे,
टटोलना उसके मन को,
वो रचना चाहता है एक ऐसा संसार,
जहाँ खिलखिला उठे उसकी बिटिया,
पर क्या करे विवश है वह,
पता है उसे बाहर क़ी हवा में गंदगी है,
नीयत में ब्याग्रह-खोट है,
क्योंकि रहता है वो जहाँ,
केवल-और-केवल वहां पुरुषवादी सोच है।
तुम्हारे मद-भरे जीत में भी,
तुम्हारे पिता क़ी निर्मम हार है,
पर मैं क्या करूँ तुम्हे यही स्वीकार है।


तारीख: 20.10.2017                                                        धीरेन्द्र नाथ चौबे"सूर्य"






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है