रात के झरोख़े से



मैं जलाए रखता हूँ रातभर ट्यूबलाइट ,
एक अकेली रूह जले तो अच्छा नहीं लगता
मैं सुनता रहता हूँ रातभर घड़ी की टिक-टिक ,
बात बस ख़ुद की ही सुनूँ तो अच्छा नहीं लगता


पर्दों को हटाकर फिर देखता रहता हूँ जाने क्या क्या 
कभी खिड़कियों से छिटकती धूल, 
कभी लाइन में चलती चीटियाँ
कभी बाहर अँधेरे में मंडराता हुआ जुगनू ,
और कभी उस ओर की दीवार को 
तांकता रहता हूँ एकटक ,


कोशिश करता हूँ सीख लूँ , धूल से बिखरना
चींटी से चलना, जुगनू से उड़ना
और दीवार से डटके खड़े रहना
फ़िर सुबह हो जाती है 
और रौशनी जुगनू को ग़ायब कर देती है
मैं बुझा देता हूँ फ़िर ट्यूबलाइट 
और सो जाता हूँ 
एक अकेले चाँद का सोना मुझे अच्छा नहीं लगता।


तारीख: 18.08.2017                                                        अनूप कुमार






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