सन्देश

 



सूखे पत्तों को निरंतर आगे ठेलती ,

पगलाई बौराई सी ,

अपने दम पर सबको उड़ा देने की हठ करती वायु, क्यों

अपनी ओर खींचती है ?

क्या है इसमें ऐसा जो यह हठी बालक की भाँति ,

वृक्षों की चोटी को अपनी धरती  छूने  को

विवश कर देती है

क्यों , यह आदेश देती है ,सागर की लहरों को ,

छूने  का निर्मल  गगन को ,जिसकी अभी तक

 इसने मात्र परछाई ही सहेजी है।

जाने क्या समाया है इसके अंदर जो यह मुझे ,

मुझ जैसी ही लगती है।

और     अगले ही पल जब यह मधुर  संगीत सुनाती

बारिश में बदल जाती है ,

तो लगता है बहुत कुछ कह जाती है

शायद यह समझाना चाहती है कि ,

 तुम भी मेरी तरह हो, अभी हठ कर  सकती हो ,लेकिन

एक समय तुम्हें  भी बदलना होगा

सोंधी महक उठाती बारिश में

तथा भर देना होगा इस जग को आनंदातिरेक से

स्वयं को समर्पित करके।


 


तारीख: 06.09.2019                                                        प्रिया गर्ग






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